कभी संघर्षरत, अब सफल: किसान चाची का नाम दुनिया भर में हुआ मशहूर

Puja Srivastav

NEWS PR डेस्क : किसान चाची आज एक सफल व्यवसायी होने के साथ-साथ सैकड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं। उनका जीवन संघर्ष और उपलब्धियां इस बात का सबूत हैं कि मजबूत हौसले के सामने कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। आने वाले छह महीनों में उनके अचार का व्यवसाय अन्य राज्यों तक फैलाने की योजना बनाई जा रही है।

अक्सर समाज में “किसान” शब्द पुरुषों के साथ ही जोड़ा जाता है, लेकिन मुजफ्फरपुर की राजकुमारी देवी उर्फ किसान चाची ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव की रहने वाली किसान चाची ने अपने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर न केवल बिहार बल्कि देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बनाई है।

राजकुमारी देवी आज खेती और अपने हाथों से बनाए गए पारंपरिक अचार के लिए पूरे देश में जानी जाती हैं। वर्ष 2019 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मश्री, से नवाजा गया, जो उनके जीवन संघर्ष और उपलब्धियों का बड़ा सबूत है। किसान चाची बताती हैं कि उनके अचार बिहार के सरकारी मॉल के साथ-साथ आसपास के थोक और खुदरा बाजारों तक उपलब्ध हैं। मांग इतनी अधिक है कि अभी वे सभी ऑर्डर पूरे नहीं कर पा रही हैं। आने वाले छह महीनों में उनके अचार का व्यवसाय अन्य राज्यों तक पहुँचाने की योजना बनाई जा रही है।

किसान चाची के यहां वर्तमान में 25 से 30 महिलाएं नियमित रूप से काम करती हैं, जबकि आम के सीजन में यह संख्या 50 से 60 तक पहुँच जाती है। अचार बिक्री की शुरुआत में 50 ग्राम का पैक मात्र 5 रुपये में बिकता था, वहीं आज 500 ग्राम के पैक की कीमत 150 से 200 रुपये है। यह उनके ब्रांड और गुणवत्ता की स्पष्ट पहचान बन चुकी है।

किसान चाची का जन्म 1953 में मुजफ्फरपुर जिले के बरूराज थाना क्षेत्र के मानिकपुर गांव में हुआ। उनके पिता रामचंद्र प्रसाद सिंह सरकारी शिक्षक थे, जबकि माता अहिल्या देवी गृहिणी थीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई गांव के बरूराज उच्च विद्यालय से की और 10वीं कक्षा तक शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1974 में उनका विवाह सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव के निवासी अवधेश कुमार चौधरी से हुआ।

हालांकि किसान चाची का जीवन कभी आसान नहीं रहा। 1990 में ससुराल में पारिवारिक विवाद के बाद उन्हें पति के साथ अलग कर दिया गया। शादी के दस साल तक उनका कोई संतान नहीं हुई, जिस वजह से लोग तरह-तरह की बातें करते और ताने भी मारते। परिस्थितियां इतनी कठिन हो गईं कि घर में खाने तक की समस्या उत्पन्न हो गई। ऐसे समय में उन्होंने खेतों में काम करना शुरू किया। समाज की टिप्पणियों और परिवार की आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। 1996 में, बस का किराया देने के पैसे न होने के कारण उन्होंने साइकिल चलाना सीखा और उसी साइकिल से खेतों की उपज को बाजार तक पहुंचाने लगीं।

साल 2002 में उन्होंने अचार बनाकर बेचना शुरू किया। 2003 में उन्हें पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा सम्मानित किया गया। इसके बाद 2007 में मुख्यमंत्री के समारोह में उन्हें किसान श्री सम्मान से नवाजा गया। उस समय वे बिहार की पहली महिला किसान थीं जिन्हें यह सम्मान मिला।

25 जनवरी 2019 को राष्ट्रपति भवन से उन्हें पद्मश्री के लिए चयन की सूचना मिली। उन्होंने सादगी से कहा, “ठीक है, अच्छा है,” क्योंकि उन्हें तब यह नहीं पता था कि पद्मश्री कितना बड़ा सम्मान है। 13 मार्च 2019 को राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया।

किसान चाची कहती हैं कि इस सम्मान के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। पहले कोई नहीं जानता था, लेकिन आज उनके नाम और मेहनत के दम पर पूरा देश और दुनिया उन्हें जानती है। उनके अचार के व्यवसाय को भी नई उड़ान मिली है और आज उनका अचार सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि देश के कोने-कोने में मिलता है।

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