सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट से शादी वैध नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

अदालत ने कहा कि बिना धार्मिक रस्मों और परंपराओं के किया गया रजिस्ट्रेशन महज कागजी औपचारिकता है और इससे शादी की पवित्रता और वैधता सिद्ध नहीं होती।

Amit Singh

NEWS PR डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि केवल मैरिज सर्टिफिकेट हासिल कर लेना ही विवाह की कानूनी वैधता तय नहीं करता। अदालत ने कहा कि बिना धार्मिक रस्मों और परंपराओं के किया गया रजिस्ट्रेशन महज कागजी औपचारिकता है और इससे शादी की पवित्रता और वैधता सिद्ध नहीं होती। यह फैसला उन मामलों में खास महत्व रखता है, जहां लोग वीजा, सरकारी लाभ या अन्य सुविधाएं पाने के उद्देश्य से केवल विवाह पंजीकरण करवा लेते हैं।

अदालत ने युवाओं से अपील की कि वे विवाह के सांस्कृतिक और कानूनी महत्व को समझें और इसे केवल औपचारिक प्रक्रिया या दिखावे तक सीमित न रखें।

हिंदू विवाह कोई व्यावसायिक समझौता नहीं:

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह को केवल मनोरंजन, खान-पान या समारोह तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह न तो कोई व्यापारिक लेन-देन है और न ही मात्र सामाजिक आयोजन। भारतीय संस्कृति में विवाह परिवार की आधारशिला है और एक पवित्र संस्था है, जो पति-पत्नी के बीच समानता, गरिमा और आपसी सहमति पर आधारित जीवनभर के रिश्ते की नींव रखती है।

धार्मिक रस्मों के बिना विवाह मान्य नहीं:

कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘स्पेशल मैरिज एक्ट’ के तहत किया गया पंजीकरण विवाह को मान्यता दे सकता है, लेकिन ‘हिंदू मैरिज एक्ट’ के मामलों में केवल रजिस्ट्रेशन पर्याप्त नहीं है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार तय धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे फेरे आदि, का संपन्न होना अनिवार्य है। इन रस्मों के बिना विवाह को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता।

रजिस्ट्रेशन केवल साक्ष्य, विवाह का आधार नहीं:

अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 8 के तहत विवाह का पंजीकरण सिर्फ इस बात का प्रमाण होता है कि विवाह हुआ है। यह अपने आप में विवाह का सृजन नहीं करता। यदि धारा 7 के अंतर्गत आवश्यक रस्में पूरी नहीं हुई हैं, तो केवल सरकारी रजिस्ट्रेशन से किसी रिश्ते को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती।

प्रमाण पत्र किया गया अमान्य:

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए फैसला सुनाया कि चूंकि निर्धारित धार्मिक रस्में पूरी नहीं की गई थीं, इसलिए संबंधित पक्षों के बीच कोई वैध हिंदू विवाह हुआ ही नहीं था। अदालत ने ‘वादिक जनकल्याण समिति’ द्वारा जारी विवाह प्रमाण पत्र और उत्तर प्रदेश सरकार के मैरिज रजिस्ट्रेशन को पूरी तरह से अमान्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष कभी भी कानूनी रूप से पति-पत्नी नहीं थे।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू विवाह में धार्मिक रस्में अनिवार्य हैं और केवल रजिस्ट्रेशन के आधार पर शादी को कानूनी वैधता नहीं मिल सकती।

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