NEWS PR डेस्क : बिहार में जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल और दुरुस्त बनाने की महत्वाकांक्षी योजना तय समय पर पूरी होती नजर नहीं आ रही है। सरकार ने इसे 31 मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन मौजूदा स्थिति उस लक्ष्य से काफी पीछे है। राज्य में जमीन सर्वे और म्यूटेशन का काम बेहद धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।
अधिकारियों की कमी और कार्यभार का दबाव इस देरी की बड़ी वजह माना जा रहा है। इसी कारण पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं और तय समयसीमा पर काम पूरा करना मुश्किल दिख रहा है।
राज्यभर में करीब 4.6 करोड़ आवेदन अब भी लंबित पड़े हैं, जो जमीन सुधार, म्यूटेशन और रिकॉर्ड अपडेट से जुड़े हैं। हर दिन नए आवेदन जुड़ रहे हैं, लेकिन उनके निपटारे की गति काफी धीमी है। इससे बैकलॉग लगातार बढ़ता जा रहा है और लक्ष्य हासिल करना और चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
सर्किल ऑफिसर्स (CO) और राजस्व कर्मियों की भारी कमी भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। कई अधिकारी या तो अवकाश पर हैं या अन्य जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। ऐसे में कई जगह काम प्रभावित हो रहा है और फाइलें लंबे समय तक लंबित पड़ी रहती हैं।
इसी बीच, सरकार द्वारा भूमि सर्वे के साथ-साथ महादलित विकास मिशन और भू-अभियान जैसी नई योजनाएं भी जोड़ी गई हैं, जिससे प्रशासनिक दबाव और बढ़ गया है। अधिकारियों को एक साथ कई काम संभालने पड़ रहे हैं, जिसका सीधा असर जमीन रिकॉर्ड सुधार की रफ्तार पर पड़ा है।
इस देरी का असर अब जमीन पर भी साफ दिखने लगा है। किसानों और आम लोगों को जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे जमीन विवाद और फसल संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। लोग बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, जिससे सिस्टम पर भरोसा कमजोर होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस योजना की तैयारी में खामियां रही हैं। टारगेट तो तय किया गया, लेकिन उसके अनुरूप संसाधन और व्यवस्था नहीं बढ़ाई गई। यही वजह है कि काम अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया। कई विशेषज्ञ इसे ‘सिस्टम फेलियर’ की स्थिति भी मान रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि अगर जल्द सुधार नहीं हुआ, तो समस्या और गंभीर हो सकती है।