NEWS PR डेस्क: बिहार की राजनीतिक फिजाओं में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आखिर कब अपनी कुर्सी छोड़ेंगे। राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद भी वे अभी तक मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं, जिससे सियासी हलचल तेज हो गई है।
दरअसल, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 101(2) और ‘प्रोहिबिशन ऑफ सिमुल्टेनियस मेंबरशिप रूल्स 1950’ के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता। राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद 14 दिनों के भीतर एक पद से इस्तीफा देना जरूरी होता है। हालांकि यह समय सीमा चुनाव परिणाम के गजट नोटिफिकेशन के बाद ही शुरू होती है।
यही वजह है कि अभी तक गजट जारी नहीं होने के कारण नीतीश कुमार तकनीकी रूप से सुरक्षित हैं और दोनों पदों पर बने हुए हैं।
इस बीच, उनका व्यस्त कार्यक्रम भी सियासी संकेत दे रहा है। 27 मार्च को रामनवमी कार्यक्रम, 31 मार्च को नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति की मौजूदगी वाला आयोजन और 4 अप्रैल को मोतिहारी में उपराष्ट्रपति के साथ कार्यक्रम—इन सबको उनकी ‘विदाई पारी’ के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तुरंत नहीं होगा। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार पहले विधान परिषद (MLC) से इस्तीफा देकर राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे, और उसके बाद ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने का फैसला लिया जाएगा।
इसके साथ ही ‘खरमास’ का भी फैक्टर सामने आ रहा है। कहा जा रहा है कि 13 अप्रैल तक खरमास होने के कारण कोई बड़ा या शुभ राजनीतिक फैसला टाला जा सकता है। ऐसे में 14 अप्रैल के बाद ही नए नेतृत्व के शपथ ग्रहण की संभावना जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गजट 30 मार्च तक जारी हो जाता है, तो उसके बाद 14 दिनों के भीतर इस्तीफा देना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने पर उनकी राज्यसभा सदस्यता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
फिलहाल स्थिति ‘वेट एंड वॉच’ वाली है। नीतीश कुमार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि दिल्ली की राजनीति में कदम रखने से पहले बिहार में उनकी राजनीतिक विरासत और गठबंधन दोनों मजबूत स्थिति में रहें। अब सबकी नजर गजट नोटिफिकेशन और उनके अगले कदम पर टिकी है।