बिहार में शराबबंदी खत्म होने की उल्टी गिनती शुरू!नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बदल सकता है बड़ा फैसला

Asha Rai

NEWS PR डेस्क: बिहार की सियासत में इन दिनों दो मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की संभावित विदाई और राज्य में लागू शराबबंदी कानून का भविष्य। राजनीतिक गलियारों में यह कयास तेज हो गए हैं कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही शराबबंदी नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है कि अगर राज्य में नई सरकार बनती है, खासकर भाजपा नेतृत्व वाली, तो शराबबंदी को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया तुरंत नहीं होगी, बल्कि इसे लागू करने में कुछ समय लगेगा। उनके अनुसार, नई सरकार को नीति में बदलाव के लिए करीब तीन महीने का समय लग सकता है, जिसके बाद जुलाई तक शराबबंदी हटने की संभावना बन सकती है।

शराबबंदी हटाने के पीछे सबसे बड़ा कारण राज्य को हो रहा आर्थिक नुकसान बताया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री  सम्राट चौधरी पहले ही संकेत दे चुके हैं कि इस नीति के कारण बिहार को हर साल लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद अवैध शराब का कारोबार जारी है, जिससे सरकार के सामने चुनौती और बढ़ गई है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 10 वर्षों में 4 करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई, 12 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए और करीब 15 लाख लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसके चलते अदालतों पर भी भारी दबाव पड़ा है। हैरानी की बात यह है कि इतने मामलों के बावजूद सजा की दर केवल 1 से 2 प्रतिशत के बीच रही है, जिससे कानून की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह मुद्दा अहम है। एनडीए के सहयोगी जीतन राम मांझी  की पार्टी लंबे समय से शराबबंदी का विरोध करती रही है। उनका तर्क है कि इस कानून का सबसे ज्यादा असर गरीब तबके पर पड़ रहा है।

ऐसे में माना जा रहा है कि यदि बिहार में सत्ता परिवर्तन होता है, तो नई सरकार आर्थिक और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए शराबबंदी कानून की समीक्षा कर सकती है और चरणबद्ध तरीके से इसे समाप्त करने का फैसला ले सकती है।

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