वट सावित्री व्रत आज: अखंड सुहाग की कामना में उमड़ी महिलाओं की आस्था

शनैश्चरी अमावस्या और सौभाग्य योग के शुभ संयोग में सुहागिन महिलाओं ने किया वट सावित्री व्रत।

Rashmi Tiwari

सुहाग, समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ शनिवार को बिहारभर में वट सावित्री व्रत श्रद्धा और आस्था के माहौल में मनाया जा रहा है। भरणी और कृत्तिका नक्षत्र, सौभाग्य योग तथा शनैश्चरी अमावस्या के दुर्लभ संयोग ने इस बार व्रत के धार्मिक महत्व को और बढ़ा दिया है। राजधानी पटना समेत कई जिलों में सुबह से ही वट वृक्षों और मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए सुहागिन महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी है।


अहले सुबह से महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर पूजा की थाल सजाकर वट वृक्षों के पास एकत्रित हो रही हैं। यहां विधि विधान के साथ पूजा कर वट वृक्ष की परिक्रमा कर रही हैं। इसके बाद नियम के मुताबिक पौराणिक कथा का श्रवण कर रही हैं। आज शनिवार को अमावस्या होने से शनैश्चरी अमावस्या का पुण्यकारी संयोग बन रहा है। वट वृक्ष में ब्रह्मा, शिव, विष्णु व देवी सावित्री विराजमान रहती है।


स्कन्द पुराण के अनुसार वट सावित्री का व्रत, पूजा और परिक्रमा के बाद भक्तिपूर्वक सत्यवान-सावित्री की कथा सुनने से सुहागिनों को अखंड सुहाग, पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, वंश वृद्धि, दांपत्य जीवन में सुख-शांति तथा वैवाहिक जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं।वट की पूजनोपरांत अन्न, वस्त्र, ऋतुफल, मिष्ठान आदि का दान करने से सुख-समृद्धि, पारिवारिक शांति, गृहक्लेश तथा अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं। ज्येष्ठ अमावस्या पर गंगा या तीर्थ में स्नान करने से सहस्त्र गौदान व कोटि सुवर्ण दान के समान पुण्य फल मिलता हैं।’
सूर्य की ताप से रक्षा
वट सावित्री की पूजा के बाद महिलाएं बरगद के पेड़ को बांस के पंखा से हवा देंगी। फिर अपने पति को भी इसी पंखा से हवा देंगी। शास्त्रों में इसका दो महत्व बताया गया है। पहला- बांस का संबंध वंश से होता है। शादी-विवाह में भी बांस की पूजा होती है। बांस के पौधे जैसे एक से दो, दो से तीन होते हुए एक पूरा समूह बना लेते है। उसी प्रकार हमारा वंश भी वृद्धि होता रहे। दूसरा – मान्यता है कि आज के दिन पति को श्रद्धा भाव से हवा देने पर पुरे गर्मी उनको सूर्य की ताप से रक्षा होती है।
यमराज ने चने के रूप में ही सत्यवान के प्राण सावित्री को वापस दिए थे
भविष्य पुराण के अनुसार, यमराज ने चने के रूप में ही सत्यवान के प्राण सावित्री को वापस दिए थे। सावित्री चने को लेकर सत्यवान के शव के पास आईं और चने को सत्यवान के मुख में रख दिया, इससे सत्यवान पुनः जीवित हो गए थे। चना के प्राणदायक महत्व होने के कारण इसे वट सावित्री की पूजा में अंकुरित चना अर्पण किया जाता है।
वट वृक्ष पूजन मंत्र –
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
रिक्रमा करने का मंत्र –
वट सावित्री व्रत की पूजा में वृक्ष पर सूत लपेटते समय इस मंत्र का जप करना चाहिए –

यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा॥

वट सावित्री व्रत का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावित्री एक ऐसी पतिव्रता स्त्री थीं, जिन्होंने अपनी बुद्धिमानी और दृढ़ निश्चय से मृत्यु के देवता भगवान यम को भी विवश कर दिया था। सावित्री ने यमराज से न केवल अपने पति सत्यवान के प्राण वापस मांगे, बल्कि अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य भी प्राप्त किया।

Share This Article