हमारी भोगवादी संस्कृति है, आज के ज़माने में “टका ही धर्मं, टका ही सर्वम

Rajan Singh

NEWSPR DESK– आज अक्षय तृतीया का दिन है। सुबह सुबह माँ ने मुझे कहा कि आज के दिन सोना खरीदने से बरकत होती है। माँ तो कह कर चली गयी पर मेरे मन में एक सवाल का कीड़ा कुलबुलाने लगा। अगर आज हम जो करेंगे वो शुभ होता है और उसमें बरकत मिलती है तो राजा मिडास की तरह सोने को ही बढाने की कामना क्यूँ!! क्यूँ ना आज हम अपने अपनों से बातें करें और उन्हें प्यार और सम्मान का एहसास कराएं। फिर पूरे साल हमारे आपसी प्यार और सम्मान की भी बरकत होगी, जैसे आज सोना खरीदने से सोने की होगी।

माना हमारी भोगवादी संस्कृति है और आज के ज़माने में “टका ही धर्मं, टका ही सर्वम” (पैसा ही धर्म और पैसा ही सबकुछ है) की मानसिकता है। दोस्तों, यह सत्य है कि अर्थ हमारी जिंदगी में महत्वपूर्ण स्थान रखता है पर रिश्ते नाते भी उतना ही अहमियत रखते हैं। हमारी खुशी के ये दोनो पूरक हैं।

कल मैं कही पढ़ रही थी कि एक किसान को राजा ने कहा, तुम आज जितना फासला तय करोगे उतना खेत तुम्हारा। तो किसान के लालच की भूख इतनी ज्यादा बढ़ गई कि वो शाम तक दौड़ता ही रह गया कि आज मै ये सारे खेत अपना कर लूँगा और थकन के कारण रात होते होते वो वही गिर गया और उसकी जिंदगी ख़त्म। पैसा इतना जरुर चाहिए हमें कि हम अपनों को अच्छी शिक्षा, अपनी और अपनों को एक आरामदायक और इज्ज़त की जिंदगी दे पायें और भविष्य के लिए थोड़े सेविंग कर पाएं। पर उससे ज्यादा की चाह क्यूँ? हम सारी उम्र कमाते रह जाते हैं अपने और अपने परिवार के लिए। यहाँ तक तो तार्किक है पर अपने आनेवाली पीढ़ी के लिए भी पैसे जोड़ते रहते है ये क्या ठीक हैं?

मेरे पापा कहते थे, “पूत कपूत तो क्यूँ धन संचय, पूत सपूत तो क्यूँ धन संचय।” मतलब अगर हमारे बच्चे अच्छे है तो खुद वो अपना बना लेंगे तो पैसे को उनके लिए जोड़ना क्यूँ? वहीं अगर हमारे बच्चे नालायक है तो जो हम आज जमा कर रहे हैं उसे वो उड़ा ही देंगे, तो उनके लिए भी जोड़ना क्यों? कहने का तात्पर्य है कि हमारी जिंदगी का अहम उद्देश्य अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षित, संस्कारी और सक्षम बनाने का हो और इसके लिए जितने अर्थ की जरूरत हो कमाएं और उन्हें भी ऐसा ही करने को प्रेरित करें। जरूरत से ज्यादा की कामना ही मूलतः व्यक्तिगत और सामाजिक पतन का प्रमुख कारण है चाहे वह कामना अर्थ, काम या किसी अन्य चीजों की हो। इसी संदर्भ में मैं एक कविता साझा करती हूं। इसे मैने काले धन को समझने के प्रयास ने लिखा था।

काला धन क्या है?

काले धन की चर्चा सरेआम होते देख
दिल में काले धन से रूबरू होने की तमन्ना जागी।
काले धन को उजला करने की, धनाढ्य सेठो की छटपटाहट देखकर
मन ने काले धन पर, प्रकाश डालने की इजाजत मांगी।

काला धन आखिर है क्या?
धन तो धन है, सौभाग्य और समृद्धि का पूरक।
धन से तो लोग, धन्ना सेठ बन जाते है,
आते जाते लोग उन्हें सलाम बजाते है।
फिर धन की इस असीम माया पर, काले रंग का मुलम्मा क्यों?
चमचमाते सिक्को पर, काले स्याहपन का नित नया अफसाना क्यों?

धन के तो कई रंगबिरंगे रूप हैं!
पुत्रधन हो तो पिता धनवान बन जाता है,
कन्या धन हो तो परिवार खुशियो से लहलहा जाता है,
विद्या औ कला धन हो तो इंसान मूल्यवान हो जाता है,
जनधन हो तो मानव कुटुम्बवान हो जाता है।
अब इन विविध धनो में हम, काला धन किसे कहेंगे?
इन धनो से धनी लोगो में, हम सम्मान किनका करेंगे?

बेचारे “धन” की तो इतने यक्ष प्रश्न सुनकर घिग्घी ही बंध गयी,
चमचमानते सिक्को की चांदनी पर, अमावस की धूमिल परत चढ़ गयी।

उसने सूखे मुंह से अपनी सफाई दी,
धन तो बेचारा धन है जो अनमोल और बेरंग है,
वो तो हमारी सोच है, जिसका चढ़ता उसपर रंग है।
सुकर्म से जो अर्जित है, वो धन श्वेत और धवल है
पाप से, जो धन संचित है, वो धन छूना अधर्म है।
धन काला है क्यूंकि,
इसमें किसी की पीड़ा और दर्द से टपकती आस है।
धन श्यामल है क्यूंकि,
इसमें अशक्य लोगो के आह की बिलखती सांस है।
तो ऐसे धन का करना क्या, जो क्षणिक सुख तो दे, पर नींद हराम कर दे।
वैसे धन को संजोना क्या, जो जब पकड़ा जाए तो सरेआम इज़्ज़त नीलाम कर दे।
इसीलिए दोस्त,
शुभ लक्ष्मी है जिस घर में, वहाँ सुसंस्कार है, बरकत है।
अशुभ धन है जिस घर में, वहाँ दुर्योग, मन की दरिद्रता और मुरव्वत है।

सामाजिक और राजनीतिक भष्टाचार रोकना है तो हमें खुद के भी कामनाओं की एक बार साकारात्मक समीक्षा करनी होगी। हैं सभी समाज और देश का एक अहम इकाई हैं। अतः हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझकर भ्रष्टाचार, जो सारी राजनीतिक और सामाजिक कुव्यवस्थाओं का जनक है, के समूल सफाया के लिए व्यक्तिगत सहयोग करना होगा। सोचिएगा जरूर।

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