NEWS PR डेस्क: बिहार सरकार ने हाल ही में सख़्त निर्देश जारी करते हुए कहा था कि ड्यूटी के दौरान गाली-गलौज करने वाले पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। मक़सद साफ़ था—पुलिस और आम जनता के बीच बिगड़ते रिश्तों को सुधारना। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
मीटिंग-दर-मीटिंग पुलिस को पीपुल्स फ्रेंडली बनाने की हिदायतें दी जाती हैं—आम लोगों से शालीन व्यवहार, कानून की मर्यादा और वर्दी की इज़्ज़त की दुहाई दी जाती है। मगर सड़कों पर तस्वीर उलटी नज़र आती है। काग़ज़ों में सुधार और ज़मीन पर बदतमीज़ी—मानो यही सिस्टम की पहचान बन गई हो।
ताज़ा मामला दरभंगा से सामने आया है, जहां एक थानाध्यक्ष का गाली-गलौज भरा वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है। आरोप है कि वर्दी के रौब में कानून की मर्यादा को खुलेआम तार-तार किया गया।
दरअसल, दरभंगा के बेंता थाना प्रभारी हरेंद्र कुमार वाहन चेकिंग अभियान चला रहे थे। इसी दौरान नो-एंट्री ज़ोन में एक कार के प्रवेश करने पर विवाद हुआ। कार में एक महिला डॉक्टर सवार थीं। आरोप है कि मामूली कहासुनी के दौरान थानाध्यक्ष ने अपना आपा खो दिया और ड्राइवर के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने लगे।
वायरल वीडियो में साफ़ देखा और सुना जा सकता है कि थानाध्यक्ष गंदी-गंदी गालियां देते हुए हेंकड़ी दिखा रहे हैं। महिला डॉक्टर वीडियो में साफ़ कहती सुनाई देती हैं—“आप चालान कीजिए, गाली मत दीजिए।”लेकिन इसके बावजूद थानाध्यक्ष का रवैया और उग्र होता चला गया।
महिला डॉक्टर का आरोप है कि थाना प्रभारी इतने आक्रामक थे कि उन्होंने सरकारी पिस्टल निकालकर डराने की कोशिश की और खुलेआम अभद्र भाषा का प्रयोग किया। महिला का कहना है कि वे बार-बार कहती रहीं कि नियम के अनुसार चालान कर दीजिए, लेकिन वर्दी का रौब दिखाकर अपमानित किया जाता रहा।
आरोप यह भी है कि थाना प्रभारी पहले भी आम लोगों के साथ बदसलूकी करते रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह रही कि एक महिला की मौजूदगी में भी गाली-गलौज नहीं रुकी। शुरुआत गाली से हुई और अंत भी गाली पर ही।
हालांकि, महिला डॉक्टर ने साहस दिखाते हुए पूरी घटना मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड कर ली। यही वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
अब बड़ा सवाल यही है—
क्या यही है बिहार पुलिस की पीपुल्स फ्रेंडली पुलिसिंग?
क्या वर्दी पहनते ही शालीनता और कानून की मर्यादा पीछे छूट जाती है?
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि बिहार में कई बार कानून किताबों तक सीमित रह जाता है, और उसका असर ज़मीनी स्तर पर नाममात्र दिखाई देता है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है की—क्या पुलिस वाकई जनता की सेवा में है, या फिर वर्दी के पीछे छिपी बदज़ुबानी ही सिस्टम की पहचान बन चुकी है ?