हर हाथ में फोन, हर कोई बन रहा ‘मीडिया’ ,सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

Neha Nanhe

NEWS PR डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि आज के समय में हर मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खुद को “मीडिया” की तरह पेश कर रहा है और किसी भी घटना का वीडियो तुरंत सोशल मीडिया पर डाल देता है। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति आरोपियों के निष्पक्ष ट्रायल के लिए खतरा बनती जा रही है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप था कि पुलिस कई बार गिरफ्तार लोगों के वीडियो और तस्वीरें अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा कर देती है, जिससे लोगों के मन में पहले से ही धारणा बन जाती है। बाद में अगर आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो जाता है, तो न्यायपालिका पर सवाल उठाए जाते हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन की इस बात से सहमति जताई कि अब हर व्यक्ति के हाथ में फोन है और वह खुद को मीडिया समझने लगा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार लोग दुर्घटना जैसी गंभीर परिस्थितियों में भी मदद करने के बजाय वीडियो बनाने में लग जाते हैं, भले ही कोई व्यक्ति घायल अवस्था में क्यों न पड़ा हो।

जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि केवल पुलिस के सोशल मीडिया व्यवहार पर सवाल उठाने के बजाय एक व्यापक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें पुलिस, पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया सभी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हों। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए तीन महीने के भीतर एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और लागू करने का समय देने की बात कही, ताकि पारदर्शिता, सूचना के अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन बनाया जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस को अपनी ब्रीफिंग में ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे आरोपियों के खिलाफ पहले से ही पूर्वाग्रह बन जाए। हालांकि, उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सोशल मीडिया और आम जनता को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सोशल मीडिया के कुछ हिस्सों को गैर-जिम्मेदार बताते हुए चिंता जताई। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि असली समस्या “बिखरे हुए” (atomized) सोशल मीडिया की है।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि छोटे शहरों और कस्बों में कुछ लोग खुद को मीडिया बताकर वाहनों पर इसका प्रदर्शन करते हैं, जिसका दुरुपयोग भी हो सकता है।

कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा व्यापक दृष्टिकोण की मांग करता है, इसलिए याचिकाकर्ता को सलाह दी गई कि वह अपनी याचिका फिलहाल वापस ले लें और बाद में विस्तृत दायरे के साथ दोबारा दाखिल करें, जब तक पुलिस के लिए SOP लागू हो जाए।

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