भ्रामक विज्ञापनों पर सरकार की बड़ी कार्रवाई, 31 कोचिंग संस्थानों पर 1.39 करोड़ से अधिक का जुर्माना

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: नई दिल्ली, 16 मई। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कोचिंग संस्थानों द्वारा किए जा रहे भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए देशभर में व्यापक कार्रवाई की है। प्राधिकरण ने अब तक 60 से अधिक नोटिस जारी किए हैं और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले 31 कोचिंग संस्थानों पर कुल 1.39 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया है।

ताजा कार्रवाई में मोशन एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड पर 10 लाख रुपये और करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी) पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। सीसीपीए ने पाया कि दोनों संस्थान छात्रों की सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे थे और विज्ञापनों में महत्वपूर्ण जानकारी छिपा रहे थे।

सीसीपीए की मुख्य आयुक्त निधि खरे और आयुक्त अनुपम मिश्र की अध्यक्षता में पारित आदेशों में कहा गया कि संस्थानों ने आईआईटी-जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं में सफल छात्रों के नाम, तस्वीरें और रैंक का इस्तेमाल कर बड़े दावे किए, लेकिन यह नहीं बताया कि इन छात्रों ने वास्तव में कौन-से कोर्स किए थे।

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मोशन एजुकेशन पर क्या आरोप लगे?

जांच में सामने आया कि मोशन एजुकेशन ने “मोशन है तो सिलेक्शन है” जैसे दावों के साथ जेईई और नीट में सफलता प्रतिशत का प्रचार किया। संस्थान ने अपनी वेबसाइट, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अखबारों में सफल छात्रों की तस्वीरें प्रकाशित कीं। हालांकि, बाद में जांच में पता चला कि विज्ञापनों में दिखाए गए अधिकांश छात्र “आई-एकलव्य” नामक विशेष ऑनलाइन रैंकर्स बैच से जुड़े थे, जो चयनित छात्रों को मुफ्त उपलब्ध कराया जाता था।

सीसीपीए ने कहा कि संस्थान ने इस तथ्य को जानबूझकर छिपाया, जिससे सामान्य छात्रों को भ्रमित किया गया। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ छात्रों के नाम और तस्वीरों का इस्तेमाल परीक्षा समाप्त होने के बाद संस्थान में दाखिला लेने के बावजूद किया गया, ताकि उनकी सफलता का श्रेय संस्थान को दिया जा सके।

सीएलसी के दावे भी पाए गए भ्रामक

सीकर स्थित करियर लाइन कोचिंग (सीएलसी) ने अपने विज्ञापनों में दावा किया था कि “1650 से अधिक सीएलसी छात्र एमबीबीएस, आईआईटी और अन्य संस्थानों में चयनित हुए।” इसके अलावा, नीट में ऑल इंडिया रैंक-100 और एम्स दिल्ली में चयन जैसे दावे भी किए गए।

जांच के दौरान संस्थान अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाया। सीसीपीए ने पाया कि जिन छात्रों की तस्वीरें विज्ञापनों में इस्तेमाल की गईं, उनमें से कई केवल टेस्ट सीरीज कोर्स में शामिल थे। इसके बावजूद संस्थान ने उन्हें अपने नियमित कक्षा कार्यक्रमों की सफलता के रूप में पेश किया।

प्राधिकरण ने यह भी पाया कि सीएलसी ने अपने चयन संबंधी आंकड़ों को लेकर विरोधाभासी बयान दिए। कभी दावा किया गया कि आंकड़े 1996 से अब तक के हैं, जबकि सुनवाई में कहा गया कि ये केवल वर्ष 2024 के हैं। सीसीपीए ने इसे भ्रामक और निराधार माना।

छात्रों और अभिभावकों की सहमति भी नहीं ली गई

सीसीपीए की जांच में यह भी सामने आया कि दोनों संस्थान छात्रों या उनके अभिभावकों की लिखित सहमति के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। जबकि वर्ष 2024 में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी सफल छात्र की तस्वीर या नाम का उपयोग करने से पहले लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है।

प्राधिकरण ने दोनों संस्थानों को तत्काल प्रभाव से भ्रामक विज्ञापन बंद करने और भविष्य में पूरी एवं सही जानकारी प्रकाशित करने का निर्देश दिया है। हालांकि, दोनों संस्थानों ने इन आदेशों को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) में चुनौती दी है।

उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा पर जोर

सीसीपीए ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत छात्रों और अभिभावकों को सही और पारदर्शी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। शिक्षा के क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापन न केवल छात्रों को गुमराह करते हैं, बल्कि उनके समय, मेहनत और आर्थिक संसाधनों को भी प्रभावित करते हैं।

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