Budget सत्र के बीच मांझी का दिखा सख्त तेवर, बिहार रूट पर की ज्यादा ट्रेनों की मांग

Amit Singh

NEWS PR डेस्क: सियासी समझ के लिए पहचाने जाने वाले हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष सह केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी शायद ही कभी ऐसा मौका छोड़ते हैं, जब बिहार के विकास या राज्य की हिस्सेदारी से जुड़े मुद्दों को जोरदार तरीके से न उठाया हो। बिहार की जरूरतों को कमियों के आईने में सामने रखना उनकी राजनीतिक शैली का अहम हिस्सा रहा है। एक बार फिर वे इसी तेवर के साथ सुर्खियों में हैं—इस बार मुद्दा है बिहार के लिए ट्रेनों की कमी।

केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार की आबादी के अनुपात में राज्य को मिलने वाली रेल सुविधाओं पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि रेलवे स्टेशनों पर उमड़ती भीड़ खुद इस बात की गवाही दे रही है कि बिहार रूट पर ट्रेनों की भारी कमी है। सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए मांझी ने लिखा कि मौजूदा समय में चल रही 12–13 ट्रेनें यात्रियों की संख्या के मुकाबले नाकाफी हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि आबादी के हिसाब से न सिर्फ ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाए, बल्कि उनमें जनरल बोगियों की संख्या भी बढ़ाई जाए।

क्यों उठी ट्रेन की मांग?

दरअसल, इस बार मांझी की मांग किसी रिपोर्ट या आंकड़े पर नहीं, बल्कि उनके निजी अनुभव पर आधारित है। यात्रा के दौरान जब वे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से प्रयागराज के लिए रवाना हो रहे थे, तब उन्होंने स्टेशन पर बिहार आने-जाने वाले यात्रियों की भारी भीड़ देखी। ट्रेन में सवार होने के बाद उन्हें सीमित ट्रेनों और कम जनरल कोच की वजह से यात्रियों को हो रही परेशानियों का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। यही अनुभव उनकी मांग का आधार बना, जो अब राजनीतिक स्वर ले चुका है।

मौके पर सटीक सियासी चाल:

इसे संयोग कहें या राजनीतिक सूझबूझ, लेकिन बजट सत्र के ठीक दौरान मांझी ने रेल मंत्रालय का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींच लिया है। सियासी तौर पर यह स्वाभाविक माना जा रहा है कि वे इस मांग को लेकर रेल मंत्री से मुलाकात करेंगे और उसे सार्वजनिक भी करेंगे। आज की राजनीति में यह दिखाना भी जरूरी होता है कि किस नेता ने जनता की ओर से कौन-सी मांग उठाई।

वैसे भी जीतन राम मांझी की राजनीति अक्सर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विकास-केंद्रित लाइन पर चलती दिखती है। सीमित जातीय आधार वाली पार्टियों के लिए विकास का एजेंडा ही राजनीति की सबसे मजबूत पटरी माना जाता है—और मांझी उसी पटरी पर अपनी सियासी गाड़ी आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

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