NEWSPR डेस्क। बिहार के स्वास्थ्य व्यवस्था के हालात तो सबको पता हैं। यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था बुरी तरह से चरमराई हुई है। आए दिन किसी न किसी अस्पताल से शिकायतें आती रहती है लेकिन इसपर सुध लेने वाला कोई नहीं है। वहीं मोतिहारी में रोगियों का इलाज करने वाला सदर अस्पताल खुद बीमार चल रहा। उसे प्रॉपर देखभाल की जरूरत है। यहां रात में बिजली चली जाती है जिससे कि अस्पताल के वार्डों में घनगोर अंधेरा कायम हो जाता है। ऐसे में मरीज का इलाज क्या एक दूसरे की श्कल भी नहीं दिख पाती है। वहीं बिजली जाने के बाद अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में इन्वर्टर के सहारे तो अन्य वार्ड में मोबाइल की रौशनी के सहारे इलाज होता है।
अस्पताल में अपने परिजन का इलाज करवाने आई मीना देवी का कहना है कि वह 2 महीने से अस्पताल में हैं और तब से वह ये झेल रहे। अस्पताल की बिजली गुल हो जाती पानी टपकता है। जिसके कारण उनके मरीज के जान पर बनी रहती। पैसे के अभाव में वह कहीं और जा नहीं सकते इसलिए विवश होकर उन्हें यहां रहना पड़ रहा है। वहीं एक ओर परिजन बताते कि बारिश के वक्त तो शाम को बत्ती गुल होती फिर आती नहीं है। जनरेटर नाम का है जो कभी चलता नहीं। हमलोगों को घंटों अंधेरे में रहना पड़ता है।
बता दें कि बिजली विभाग की 24 घंटे वाली इमरजेंसी लाइन का 6 महीने बाद भी कार्य अधूरा है जिसका खामियाजा रोगियों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ता है। यहां के हुक्मरानों की लापरवाही व प्रसाशनिक लापरवाही के कारण इस अस्पताल में सुविधाओं का घोर अभाव है वहीं दूसरी ओर यहां आने वाले मरीज अपनी जान हथेली पर लेकर आने को विवश हैं। अस्पताल के बाहर भारी जलजमाव के कारण अक्सर अस्पताल टापू में तब्दील रहता है, तो वहीं इतने बड़े अस्पताल में एक अदद लाइट की समुचित व्यवस्था नही है।
सरकारी बिजली के नहीं रहने पर ये अस्पताल भूत बंगला लगता है। कागजों पर लाखों करोड़ों खर्च करने वाला ये अस्पताल महज एक जनरेटर की सुविधा मरीजों को उपलब्ध कराने में असफल है। जिसका नतीजा ये है कि बिजली गुल होने पर यहां घुप्प अंधेरा छा जाता है। हैरानी की बात तो यह है कि मरीज के ऑपरेशन के दौरान भी बिजली गुल हो जाती और डॉक्टर को मजबूरन टोर्च की रोशनी में मरीजो का ऑपरेशन करना पड़ता। कभी कभी मोबाइल की रोशनी में या फिर ऑपरेशन को कुछ देर के लिए रोक दिया जाता है।
सदर अस्पताल के सिस्टम की पोल खोलने वाली ये तस्वीरें आपको चौका देंगी लेकिन ये सच है इस अस्पताल की हालत ऐसी ही है। भले ही इस अस्पताल के रखरखाव के लिए लाखों का बिल प्रति महीने बनाया जाता हो लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। यहां न मरीजो के इलाज व रहने की समुचित व्यवस्था है और न सही ढंग से बिजली पानी का इंतज़ाम। सबकुछ यहां भगवान भरोसे चलता है और अधिकारी व अस्पताल प्रबंधक सिर्फ कागजी खानापूर्ति करने में व्यव्स्त रहते।
मोतिहारी से धर्मेंद्र की रिपोर्ट