पीएम मोदी के उपस्थिति में नितिन नबीन बने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष; मजबूत पार्टी, बड़ी ज़िम्मेदारी और 2026 का इम्तिहान

Amit Singh

NEWS PR डेस्क: बिहार की राजधानी पटना स्थित बांकीपुर विधानसभा सीट से पांच बार के विधायक नितिन नबीन को आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष औपचारिक रूप से चुन लिया गया। नबीन को ऐसे वक्त संगठन की कमान मिली है, जब पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 12 सालों से भाजपा नीत एनडीए की सरकार है. नितिन नबीन बीजेपी के अध्यक्ष तब बने हैं, जब बीजेपी ऐतिहासिक रूप से बहुत मज़बूत है. बीजेपी की 240 लोकसभा सीटें हैं और 21 राज्यों में बीजेपी या उसकी अगुआई वाले गठबंधन एनडीए की सरकार है. राज्यसभा में भी बीजेपी के 99 सांसद हैं। अभी हाल में ही BMC चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की है।

नितिन नबीन का जन्म भारतीय जनता पार्टी के जन्म के करीब डेढ़ महीने बाद, 23 मई 1980 को हुआ था। दिलचस्प संयोग यह है कि जिस पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई, आज उसी पार्टी की कमान नितिन नबीन के हाथों में है। विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालते ही उनके सामने पहले ही वर्ष में कई बड़ी और निर्णायक चुनौतियाँ खड़ी है। अब राजनीतिक गलियारों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बीजेपी के साथ ही जन्मी यह पीढ़ी का नेता इन चुनौतियों से कैसे पार पाता है और क्या वह पार्टी को एक नई ऊर्जा और नई दिशा दे पाता है।

बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन: 2026 की रणभूमि में निर्णायक चुनौतियाँ

भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन की ताजपोशी ऐसे समय में हुई है, जब पार्टी के सामने 2026 के विधानसभा चुनाव एक बड़े राजनीतिक इम्तिहान की तरह खड़े हैं। पूर्व, दक्षिण और युवा मतदाताओं- तीनों मोर्चों पर उन्हें एक साथ रणनीति, संगठन और नेतृत्व की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

असम: सत्ता की हैट्रिक और एंटी-इनकम्बेंसी की परीक्षा

मार्च-अप्रैल 2026 में होने वाले असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश करेगी। पिछले दस वर्षों से राज्य में भाजपा की सरकार है। सर्वानंद सोनोवाल के बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी मजबूत दिखती है, लेकिन लंबी सत्ता के कारण एंटी-इनकम्बेंसी, जातीय संतुलन और क्षेत्रीय अस्मिताओं को साधना नितिन नबीन के लिए बड़ी चुनौती होगी।

पश्चिम बंगाल: पूर्वी भरता का सबसे कठिन किला

बिहार और ओडिशा के बाद पूर्वी भारत में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक रणक्षेत्र पश्चिम बंगाल है। 15 वर्षों से ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है। 2026 के चुनाव में भाजपा के लिए सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि संगठन को जमीन पर मजबूत करना होगा। बंगाल में “कमल खिलाना” नितिन नबीन की नेतृत्व क्षमता का सबसे बड़ा इम्तिहान होगा।

दक्षिण भारत: वोट से सीट तक की दूरी

केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी तीनों राज्यों में 2026 में ही चुनाव होने हैं। केरल में बीजेपी को करीब 20 फीसदी वोट मिल रहे हैं, लेकिन यह समर्थन अब तक बड़े पैमाने पर सीटों में नहीं बदल पाया है। तिरुवनंतपुरम में मेयर पद जीतना एक संकेत जरूर है, पर कांग्रेस और लेफ्ट के वर्चस्व को तोड़कर तीसरी नहीं, निर्णायक ताकत बनना अभी बाकी है।

तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन पिछले एक दशक से सत्ता में है। यहां बीजेपी की राह गठबंधन राजनीति से होकर गुजरती है। एआईडीएमके और अन्य दलों के साथ तालमेल साधकर सत्ता में वापसी की रणनीति नितिन नबीन की राजनीतिक सूझ-बूझ की असली परीक्षा होगी।

ZEN-G और युवा भारत: सबसे निर्णायक मोर्चा

देश की लगभग 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। डिजिटल, आकांक्षी और मुद्दों पर आधारित यह पीढ़ी सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि अवसर, रोजगार और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि से प्रभावित होती है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होगी कि वे जेन-जी को बीजेपी के साथ जोड़े रखें, सिर्फ चुनावी समर्थन नहीं, बल्कि वैचारिक सहभागिता के साथ।

नितिन नबीन का कार्यकाल केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक राजनीतिक नेतृत्व का काल होगा। 2026 के चुनाव बीजेपी के लिए क्षेत्रीय विस्तार, सत्ता की निरंतरता और युवा विश्वास तीनों का अग्निपरीक्षा हैं। इन चुनौतियों को अवसर में बदलना ही उन्हें एक प्रभावी और यादगार राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाएगा।

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