बिहारियों के अपमान का जवाब बैलेट से, मुंबई में बदली सियासी तस्वीर

Puja Srivastav

NEWS PR डेस्क : मुंबई महानगर पालिका चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि भाषा के नाम पर नफरत की राजनीति करने की कीमत चुकानी पड़ती है। इन परिणामों ने शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे को कड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया है।

मुंबई महानगर पालिका चुनाव से ठीक तीन दिन पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने एक बार फिर अपने विवादित अंदाज़ में भाषण दिया था। इस दौरान उन्होंने मुंबई में रहने वाले हिंदी भाषी लोगों को निशाने पर लेते हुए कहा था कि उन्हें किसी भाषा से आपत्ति नहीं है, लेकिन अगर हिंदी को जबरन थोपा गया तो वे विरोध करेंगे।

हालांकि भाषा के नाम पर नफरत की राजनीति करने का खामियाजा मनसे को बीएमसी चुनाव में भुगतना पड़ा। मुंबई में मनसे महज़ 6 वार्डों में ही जीत दर्ज कर सकी और पार्टी को कुल 2.87 प्रतिशत वोट मिले। यह आंकड़ा 8 सीटें जीतने वाली एआईएमआईएम के 2.61 प्रतिशत वोटों से थोड़ा ही अधिक रहा। वोटरों का यह सख्त संदेश सिर्फ मनसे तक सीमित नहीं रहा। जनता ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को भी झटका दिया, उसी पार्टी को जिससे अलग होकर राज ठाकरे ने मनसे का गठन किया था।

मुंबई में उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों—जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान—से आए लोगों की बड़ी आबादी रहती है। यह शहर हमेशा से बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक रहा है और कभी भी खुद को किसी एक भाषा की सीमाओं में नहीं बांधता।कांदिवली, मलाड, मीरा-भायंदर, कुर्ला, गोरेगांव और घाटकोपर जैसे इलाकों में उत्तर भारतीय मतदाताओं की संख्या काफी प्रभावशाली मानी जाती है। इन क्षेत्रों में इन मतदाताओं का रुझान परंपरागत रूप से भाजपा और कांग्रेस की ओर रहा है। इसकी एक बड़ी वजह पहले शिवसेना (जो अब शिवसेना-यूबीटी है) और बाद में मनसे द्वारा की गई भाषा आधारित और विभाजनकारी राजनीति को माना जाता है।

नगर निगम चुनाव के नतीजों में कुल 227 सीटों में से भाजपा ने 89 सीटों पर जीत दर्ज की है। शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं, जबकि शिवसेना को 29 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस ने 24 सीटें जीतीं, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को 6 सीटें मिलीं, एनसीपी के खाते में 3 सीटें आईं और 11 सीटों पर अन्य उम्मीदवार विजयी रहे। लंबे समय से बीएमसी पर दबदबा बनाए रखने वाली शिवसेना के लिए यह चुनाव करारी हार लेकर आया है । नगर निगम चुनाव से पहले राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी विरोधी राजनीति को तेज कर दिया था। दोनों नेताओं ने भाजपा पर मुंबई में हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए इसे सियासी मुद्दा बनाया।

राज ठाकरे ने हिंदी भाषी समुदाय को निशाने पर लेते हुए कहा था कि वे चारों तरफ से महाराष्ट्र में आ रहे हैं और मराठी लोगों का हक छीन रहे हैं। उनका दावा था कि अगर जमीन और भाषा दोनों हाथ से निकल गईं, तो मराठी समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसी आधार पर उन्होंने मराठी लोगों से एकजुट होने की अपील की थी।

मनसे प्रमुख ने यहां तक कहा था कि बीएमसी का यह चुनाव मराठियों के लिए निर्णायक और आखिरी मौका है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर इस बार अवसर चूक गया, तो भविष्य में मराठी समाज को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। राज ठाकरे ने कक्षा पाँच तक हिंदी को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव को एक सुनियोजित साजिश करार दिया था। उन्होंने भाजपा पर मुंबई को लूटने और शहर को गुजरात के आर्थिक प्रभाव क्षेत्र में ले जाने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया था।

वहीं उनके भाई उद्धव ठाकरे ने भी इसी तेवर में भाजपा पर हमला बोला था। उन्होंने कहा था कि भाजपा नकली हिंदुत्व का सहारा लेती है और हर चुनाव से पहले समाज को बांटने की राजनीति करती है। उद्धव ठाकरे ने तमिलनाडु भाजपा नेता अन्नामलाई के उस बयान को भी आड़े हाथों लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि बॉम्बे महाराष्ट्र का नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय शहर है।

इस बयान को लेकर राज ठाकरे ने अन्नामलाई का मजाक उड़ाते हुए उन्हें ‘रसमलाई’ कहा था और तंज कसते हुए टिप्पणी की थी—“बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी। चुनाव से पहले ठाकरे भाइयों का गैर-मराठी भाषी समुदाय के प्रति विरोध का सिलसिला यहीं थमा नहीं था। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में भाषा के मुद्दे से आगे बढ़ते हुए उत्तर भारतीयों को उनके खान-पान को लेकर निशाने पर लिया गया।

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