NEWS PR डेस्क: बिहार में पारदर्शी, डिजिटल और जन-केंद्रित भूमि सुधारों को लेकर उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा सख्त रुख अपनाए हुए हैं। इसी कड़ी में राज्य सरकार ने एक ही भूमि पर कैडस्ट्रल सर्वे और रिविजनल सर्वे के दो अलग-अलग अधिकार अभिलेख को लेकर बड़ा और स्पष्ट फैसला लिया है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव सी.के. अनिल ने 3 फरवरी को राज्य के सभी जिलों के समाहर्ताओं (DM) को पत्र जारी कर इस संबंध में स्थिति स्पष्ट की है। पत्र में यह बताया गया है कि यदि किसी सरकारी भूमि के लिए कैडस्ट्रल और रिविजनल सर्वे में दो अलग-अलग प्रविष्टियां हैं, तो ऐसी स्थिति में प्रशासन को क्या कार्रवाई करनी होगी।
विभाग ने बताया कि यह मुद्दा मुख्यमंत्री की समृद्धि यात्रा के दौरान भी उठा था। इसके अलावा उपमुख्यमंत्री के जन-कल्याण संवाद के दौरान दरभंगा प्रवास में जिलाधिकारी ने इस विषय पर विभाग से मार्गदर्शन मांगा था।
कैडस्ट्रल सर्वे को माना जाएगा मूल अभिलेख:
प्रधान सचिव ने स्पष्ट किया है कि कैडस्ट्रल सर्वे वर्ष 1890 से 1920 के बीच किया गया था, जो राज्य का पहला भूमि सर्वे था। इसमें सरकारी भूमि, सैरात और गैरमजरूआ भूमि का स्पष्ट उल्लेख है। ऐसे में कैडस्ट्रल सर्वे की प्रविष्टियों को ही भूमि का मूल और प्रारंभिक अभिलेख माना जाएगा।
सरकारी भूमि का नेचर बदलने के लिए जरूरी होगा वैध आदेश:
पत्र में कहा गया है कि यदि कैडस्ट्रल सर्वे में कोई भूमि सरकारी दर्ज है, तो रिविजनल सर्वे में उसका स्वरूप तभी बदला जा सकता है जब सरकार की शक्ति का प्रयोग करते हुए समाहर्ता ने उस भूमि का वैध रूप से किसी निजी व्यक्ति के नाम बंदोबस्त किया हो और उसका प्रमाण राज्य सरकार के अभिलेखों में उपलब्ध हो। सरकारी भूमि का रैयतीकरण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसका पालन अनिवार्य है।
यदि कोई निजी व्यक्ति सरकारी भूमि पर स्वामित्व का दावा करता है, तो उसे भूमि के वैध हस्तांतरण से संबंधित साक्ष्य समाहर्ता के समक्ष प्रस्तुत कर प्रमाणित करना होगा।
लैंड सेटलमेंट हुआ हो तभी निजी मानी जाएगी भूमि:
सरकार ने सभी समाहर्ताओं को निर्देश दिया है कि यदि रिविजनल सर्वे में सरकारी भूमि किसी निजी व्यक्ति के नाम अंकित हो, तब भी वह भूमि सरकारी ही मानी जाएगी, जब तक कि समाहर्ता के आदेश से विधिवत लैंड सेटलमेंट न किया गया हो।
30 साल से अधिक कब्जा होने पर भी होगी कार्रवाई:
विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन सर्वेक्षणों में खतियान का अंतिम प्रकाशन हो चुका है और भूमि की प्रकृति सरकारी दर्ज है, उसे सरकारी भूमि ही माना जाएगा और उसका संरक्षण किया जाएगा। सभी अंचल अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि सरकारी भूमि पर यदि 30 वर्ष या उससे अधिक समय से भी अनधिकृत कब्जा हो, तब भी नोटिस जारी कर भूमि का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का कोई विपरीत आदेश लागू न हो।
कुल मिलाकर, दोहरे अधिकार अभिलेखों पर सरकार के इस सख्त और स्पष्ट फैसले से सरकारी भूमि की सुरक्षा मजबूत होगी और अवैध कब्जे व फर्जी दावों पर प्रभावी रोक लगेगी।