सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की दी मंजूरी, कहा- ‘महिला की मर्जी सर्वोपरि’

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और संवेदनशील मामले में यह साफ कर दिया है कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने एक नाबालिग लड़की को 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त कराने की अनुमति देते हुए महिला के शारीरिक स्वायत्तता और जीवन के अधिकार को सर्वोपरि बताया है।

जस्टिस बी. वी. नागरथना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि महिला का अपने शरीर और भविष्य को लेकर निर्णय लेने का अधिकार किसी भी परिस्थिति में छीना नहीं जा सकता। अदालत ने माना कि यह मामला केवल कानून का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और पीड़िता के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

‘महिला की मर्जी सर्वोपरि’:

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कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई नाबालिग लड़की मानसिक या शारीरिक रूप से मां बनने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। अदालत ने इस बात को अहम माना कि पीड़िता ने साफ तौर पर मां बनने से इनकार किया है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया है कि पूरी सुरक्षा और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए।

*24 हफ्ते की सीमा बाधा नहीं*

सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून के तहत आमतौर पर 24 सप्ताह तक ही गर्भपात की अनुमति है, लेकिन सिर्फ समय सीमा के आधार पर किसी महिला को मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस नागरथना ने कहा कि यदि पीड़िता स्पष्ट रूप से गर्भ नहीं चाहती, तो 30 सप्ताह की अवधि को उसके अधिकारों के आड़े नहीं आने दिया जा सकता।

*कानून से ऊपर इंसानियत*

अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि यह फैसला लेना आसान नहीं था। एक ओर अजन्मे बच्चे का प्रश्न था, तो दूसरी ओर एक नाबालिग बच्ची का भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य। लेकिन कोर्ट ने प्राथमिकता पीड़िता की गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को दी।

*न्यायपालिका का स्पष्ट संदेश*

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को महिला अधिकारों की दिशा में एक बड़ी नजीर माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी भी परिस्थिति में महिला की पसंद, उसकी सहमति और उसका भविष्य सबसे ऊपर है। यह फैसला समाज को यह संदेश देता है कि न्याय केवल कानून नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना के साथ किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि महिला की सहमति, उसकी गरिमा और उसका भविष्य हर हाल में सर्वोपरि है, और किसी को भी जबरन मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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