NEWS PR डेस्क: पटना, 2 अप्रैल। बिहार की राजनीति में इन दिनों सियासी ‘खेल’ अपने चरम पर है। राज्यसभा चुनाव के बाद अब सभी राजनीतिक दलों की नजर आगामी विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव पर टिक गई है। सीटों के गणित, सहयोगियों के हिस्से और जातीय समीकरणों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में गहन मंथन जारी है।
जून 2026 में विधान परिषद की कुल 11 सीटों पर चुनाव होना है, जिनमें 9 सीटें नियमित रूप से खाली हो रही हैं, जबकि 2 सीटें उपचुनाव के जरिए भरी जाएंगी। ये उपचुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मंत्री मंगल पांडेय के इस्तीफे के कारण रिक्त हुई सीटों पर होंगे। नियमित रूप से खाली होने वाली सीटों में राजद, जदयू, भाजपा और कांग्रेस के सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
विधानसभा में विधायकों की संख्या के आधार पर इस चुनाव में एनडीए का पलड़ा भारी माना जा रहा है। अनुमान है कि 11 में से 10 सीटें एनडीए के खाते में जा सकती हैं, जबकि महागठबंधन को केवल एक सीट मिलने की संभावना है। एनडीए के भीतर भी सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा तेज है। जदयू और भाजपा को तीन-तीन सीटें मिल सकती हैं, जबकि एक-एक सीट सहयोगी दलों—लोजपा (रामविलास) और अन्य को दी जा सकती है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि मंत्री दीपक प्रकाश, जो फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, उन्हें विधान परिषद के जरिए सदन में लाया जा सकता है। वहीं मंगल पांडेय के इस्तीफे से खाली हुई सीट भी एनडीए के लिए अहम मानी जा रही है।
दूसरी ओर, महागठबंधन की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर नजर आ रही है। विपक्ष के पास कुल 41 विधायक हैं, जबकि एक एमएलसी को जिताने के लिए 25 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में महागठबंधन एक ही उम्मीदवार को आसानी से जीत दिला सकता है, जबकि दूसरी सीट के लिए उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजद इस एक सीट पर अपने उम्मीदवार को मौका देता है या फिर सहयोगी दल एआईएमआईएम को। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में हुए समीकरणों के बाद एआईएमआईएम भी अपनी हिस्सेदारी की उम्मीद कर रही है।
कुल मिलाकर, बिहार में एमएलसी चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है। एनडीए जहां बढ़त बनाए हुए है, वहीं महागठबंधन के सामने सीमित विकल्प हैं। आने वाले दिनों में सीटों के अंतिम बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन के साथ यह सियासी खेल और दिलचस्प होने की संभावना है।