पंचायतों में सही पोषण से घट रहा कुपोषण, जनप्रतिनिधियों की पहल से बदल रही तस्वीर

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: पटना, 4 मई: बिहार की पंचायतों में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अब सकारात्मक परिणाम देने लगी है। कुपोषण, एनीमिया और कैल्शियम की कमी जैसी गंभीर समस्याओं को खत्म करने के लिए गांव स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। पोषण वाटिका की स्थापना और व्यापक जागरूकता अभियान के जरिए पंचायतों में स्वास्थ्य सुधार की नई कहानी लिखी जा रही है।

पोषण वाटिका से मिल रहा समाधान, गांव में बढ़ी जागरूकता

नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड स्थित तेलमर पंचायत में मुखिया विद्यानंद बिंद ने कुपोषण के खिलाफ अनोखी पहल की है। उन्होंने गांव में ऐसे क्षेत्रों की पहचान की, जहां पोषण के साधनों की कमी थी। इसके बाद लोगों को अपने घर के पास ही पोषण वाटिका लगाने के लिए प्रेरित किया।

पंचायती राज विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने ग्राम सभाओं में पोषण के महत्व पर चर्चा की। आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं के सहयोग से महिलाओं को जागरूक किया गया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने खर्च पर बीज मंगवाकर खासतौर पर दलित बस्तियों में पोषण वाटिकाएं लगवाईं, जिससे वहां की महिलाओं और बच्चों को हरी-पत्तेदार सब्जियां आसानी से मिल सकें और एनीमिया की समस्या दूर हो सके।

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इस पहल का असर अब पूरे गांव में दिखने लगा है। लोग छोटी-छोटी जगहों में भी पौष्टिक सब्जियां उगा रहे हैं। मुखिया ने “सही पोषण, देश रोशन” का नारा देकर अभियान को और मजबूती दी है।

‘डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत’ की दिशा में अनोखी पहल

नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के मोहद्दीनपुर पंचायत में मुखिया प्रभु प्रसाद ने पोषण सुधार के लिए एक नई मुहिम शुरू की है। उन्होंने पंचायत को ‘डिब्बे का दूध मुक्त’ बनाने का लक्ष्य रखा है, ताकि बच्चों को प्राकृतिक और बेहतर पोषण मिल सके।

प्रभु प्रसाद स्वयं महिलाओं को स्तनपान के महत्व के बारे में जागरूक कर रहे हैं। पोषण माह के दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों पर आयोजित कार्यक्रमों में महिलाओं को चार प्रमुख स्वास्थ्य जांच, आयरन और कैल्शियम की गोलियों के सेवन, पूरक पोषण और विशेष रूप से जन्म के बाद छह महीने तक केवल मां का दूध देने के महत्व के बारे में बताया गया।

लोगों के सहयोग से अब इस अभियान को पूरे पंचायत में लागू करने की तैयारी चल रही है। जल्द ही मोहद्दीनपुर पंचायत को औपचारिक रूप से ‘डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत’ घोषित किया जाएगा।

जनप्रतिनिधियों की पहल से बदल रही तस्वीर

दोनों पंचायतों के जनप्रतिनिधियों की यह पहल यह साबित करती है कि जमीनी स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सहभागिता बेहद जरूरी है।

बिहार की पंचायतों में पोषण को लेकर चल रहे ये प्रयास न केवल महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बना रहे हैं, बल्कि समाज में जागरूकता और आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहे हैं। यह पहल आने वाले समय में पूरे राज्य के लिए एक मॉडल बन सकती है।

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