NEWS PR डेस्क:गया: जिंदगी ने उससे दोनों हाथ छीन लिए, लेकिन उसके सपनों और हौसलों को नहीं। गया जिले के केंदुआ गांव का रहने वाला बृजेश कुमार आज उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है, जो छोटी-छोटी मुश्किलों में हार मान लेते हैं। दोनों हाथ न होने के बावजूद बृजेश पैरों से मोबाइल चलाता है, पैरों से लिखता है और कटे हुए हाथ के अंतिम सिरे में रबर के सहारे मार्कर बांधकर सैकड़ों बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी देता है। उसका सपना आज भी इंजीनियर बनने का है।

11 हजार वोल्ट के करंट ने बदल दी जिंदगी
बृजेश बताते हैं कि वर्ष 2015 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद वह 11 हजार वोल्ट के बिजली के करंट की चपेट में आ गए थे। गंभीर रूप से झुलसने के बाद उनका करीब पांच वर्षों तक इलाज चला। जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनके दोनों हाथ काटने पड़े। शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने जीवन से हार नहीं मानी।

पैरों से चलाता है मोबाइल, खुद करता है लगभग सारे काम
आज बृजेश बिना किसी की मदद के पैरों और मुंह की सहायता से मोबाइल चलाते हैं। वे फोन पर बात करने से लेकर सोशल मीडिया, यूट्यूब, इंटरनेट और अन्य मोबाइल ऐप्स का सहजता से उपयोग करते हैं। लगातार अभ्यास के बल पर उन्होंने खुद को इतना सक्षम बना लिया कि रोजमर्रा के अधिकांश काम स्वयं कर लेते हैं।

कटे हाथ में मार्कर बांधकर बच्चों को पढ़ाते हैं
बृजेश की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ उनका संघर्ष नहीं, बल्कि समाज के लिए उनका योगदान भी है। वह कटे हुए हाथ के अंतिम सिरे में रबर की मदद से मार्कर बांधकर ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं और पहली से दसवीं कक्षा तक के बच्चों को निशुल्क पढ़ाते हैं। पिछले तीन वर्षों से वह अपने पैतृक गांव केंदुआ और ननिहाल मंझियावा में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को नियमित शिक्षा दे रहे हैं। उनका मानना है कि गरीबी किसी बच्चे की पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए।
इंजीनियर बनने का सपना अब भी जिंदा
गरीबी, शारीरिक चुनौतियों और लंबे इलाज के बावजूद बृजेश ने पढ़ाई जारी रखी। वर्ष 2023 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की और अब स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। उनका सपना इंजीनियर बनने का है, जिसके लिए वे लगातार तैयारी भी कर रहे हैं।हालांकि, उनका कहना है कि कई नौकरियों और अवसरों के लिए आवेदन करने पर केवल दोनों हाथ नहीं होने की वजह से उनके आवेदन अस्वीकार कर दिए जाते हैं। उनका मानना है कि दिव्यांगों को वास्तविक अवसर और समान अवसर मिलने चाहिए।
“हम जैसे लोग ही इतिहास रचते हैं”
बृजेश कहते हैं कि कई संस्थान यह कहकर आवेदन खारिज कर देते हैं कि बिना हाथों के वह काम कैसे करेंगे। लेकिन उनका विश्वास है कि मेहनत और इच्छाशक्ति के सामने कोई भी शारीरिक कमी बाधा नहीं बन सकती। वे कहते हैं, “दोनों हाथ जरूर नहीं हैं, लेकिन मेरे सपने आज भी जिंदा हैं। मैं मेहनत कर रहा हूं। एक दिन इंजीनियर बनने का सपना जरूर पूरा होगा। बस जरूरत है कि समाज और सरकार हम जैसे लोगों की क्षमता को पहचानें।”
संघर्ष से बनी प्रेरणा
आज बृजेश सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी काम कर रहे हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों तो हर चुनौती को पार किया जा सकता है। पैरों से मोबाइल चलाने से लेकर बच्चों को पढ़ाने तक, बृजेश हर दिन यह साबित कर रहे हैं कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि इंसान के हौसलों में होती है। गया से आशिष कुमार की रिपोर्ट
