बिहार का ‘लखपति बनाने वाला पहाड़’: गया में बारिश के साथ जमीन पर आते हैं मनिया-मोती, लाखों में होती है बिक्री; ग्रामीणों की बदल रही तकदीर

Shreya Raj
हंसराज पर्वत से मिलने वाले कथित अनमोल रत्नों की तस्वीर, जिनमें मनिया, मोती और मूंगा जैसे रत्न शामिल हैं।

NEWS PR डेस्क :गया: बिहार के गया जिले में एक ऐसा पहाड़ है, जिसे स्थानीय ग्रामीण अपनी बदलती तकदीर से जोड़कर देखते हैं। मानसून की बारिश शुरू होते ही इस पहाड़ की मिट्टी और पत्थरों के साथ कथित तौर पर कई तरह के अनमोल रत्न बहकर आसपास के गांवों और खेतों तक पहुंचते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इनमें मनिया, मूंगा, मोती, हीरा और दूसरे कीमती पत्थर शामिल होते हैं। कई रत्नों की बिक्री हजारों से शुरू होकर लाखों रुपये तक में होने की बात कही जाती है। वहीं, कुछ स्थानीय जानकार इन रत्नों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक होने का दावा करते हैं।

हंसराज पर्वत की गोद में बसा है हसरा गांव

गया जिला मुख्यालय से करीब 35-40 किलोमीटर दूर वजीरगंज प्रखंड का हसरा गांव हंसराज पर्वत की गोद में बसा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि गांव का नाम भी हंसराज पर्वत के नाम पर पड़ा है। ग्रामीण इस पहाड़ को धार्मिक और प्राकृतिक, दोनों दृष्टि से विशेष मानते हैं। हंसराज पर्वत पर भगवान भोलेनाथ का एक प्राचीन मंदिर और शिवलिंग भी मौजूद है। ग्रामीणों के बीच मान्यता है कि शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था। इसी वजह से इस स्थान से लोगों की गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है।

इसी पहाड़ से बारिश के मौसम में कथित तौर पर मिलने वाले रत्नों ने हंसराज पर्वत को इलाके में एक अलग पहचान दी है। ग्रामीण इसे भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद भी मानते हैं।

मानसून आते ही रत्न तलाशने निकल पड़ते हैं लोग

हसरा गांव के लोगों को मानसून का बेसब्री से इंतजार रहता है। बारिश शुरू होते ही कई ग्रामीण पहाड़ से आने वाले पानी के रास्तों, खेतों और आसपास की जमीन पर रत्न तलाशने निकल पड़ते हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, तेज बारिश के दौरान पहाड़ की मिट्टी कटने लगती है और पानी के बहाव के साथ पत्थर और कथित रूप से रत्न भी नीचे की ओर आ जाते हैं। बारिश के बाद जब खेतों की मिट्टी खुलती है तो वहां भी इन्हें तलाशा जाता है।

इस दौरान किसी को कुछ नहीं मिलता तो किसी के हाथ में ऐसा पत्थर लग जाता है, जिसे बेचकर उसे अच्छी रकम मिल जाती है। यही उम्मीद लोगों को हर साल मानसून के दौरान पहाड़ और खेतों की तरफ खींच लाती है।

करीब 150 घरों का गांव, कई परिवारों की बदली आर्थिक स्थिति

स्थानीय जानकारी के अनुसार हसरा गांव में करीब 150 घर हैं और आबादी लगभग 1,000 के आसपास है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले गांव में बड़ी संख्या में कच्चे मकान हुआ करते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। ग्रामीण इस बदलाव का एक कारण हंसराज पर्वत से बारिश के मौसम में मिलने वाले रत्नों को बताते हैं। उनका कहना है कि किसी को मनिया मिला तो किसी को मूंगा या अन्य कीमती पत्थर। इन्हें बेचकर कुछ लोगों ने घर बनवाए तो कुछ ने बाइक और दूसरे जरूरी सामान खरीदे।

गांव के ग्रामीण गिरनी मांझी का उदाहरण भी दिया जाता है, जिन्होंने कथित तौर पर रत्न बेचकर घर बनाया और बाइक खरीदी। एक अन्य ग्रामीण के बारे में बताया गया कि परिवार में किसी की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार और अन्य क्रियाकर्म का खर्च रत्न बेचकर पूरा किया गया। खर्च निकालने के बाद भी उनके पास कुछ रकम बच गई।

पहले हजारों में बिकते थे रत्न, अब लाखों तक पहुंची कीमत

ग्रामीणों के मुताबिक, पहले जानकारी के अभाव में यहां मिलने वाले पत्थर और रत्न कुछ हजार रुपये में ही बेच दिए जाते थे। कोई 5 हजार, कोई 10 हजार तो कोई 20 हजार रुपये में इन्हें खरीदारों को दे देता था। समय के साथ लोगों में जागरूकता बढ़ी और बाहर से आने वाले खरीदारों की संख्या भी बढ़ी। इसके बाद इनकी कीमतों में भी इजाफा होने लगा।

ग्रामीणों का दावा है कि अब कुछ रत्न 1 लाख से 5 लाख रुपये तक में बिक चुके हैं। कुछ मामलों में डेढ़ लाख और 2 लाख रुपये तक मिलने की बात भी कही गई है। एक ग्रामीण ने 1.35 लाख रुपये में रत्न बिकने का दावा किया। इन कीमतों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अलग-अलग रत्नों की कीमत उनकी वास्तविक पहचान, गुणवत्ता, उम्र और बाजार की मांग पर निर्भर करती है।

राजस्थान और बोधगया से भी पहुंचते हैं खरीदार

स्थानीय लोगों के अनुसार हंसराज पर्वत से मिलने वाले रत्नों को खरीदने के लिए गया, बोधगया और राजगीर के अलावा राजस्थान से भी खरीदार पहुंचते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ खरीदार आभूषण और रत्नों के कारोबार से जुड़े हैं, जबकि कुछ लोगों को प्राकृतिक और पुराने पत्थरों की जानकारी है। मानसून के दौरान कुछ खरीदार नियमित रूप से इलाके में पहुंचते हैं और ग्रामीणों से रत्नों के बारे में जानकारी लेते हैं।

ग्रामीणों का यह भी दावा है कि बोधगया आने वाले कुछ विदेशी लोग भी इन रत्नों में रुचि दिखाते हैं, हालांकि विदेशी बाजार में इनकी बिक्री और बताई गई कीमतों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

50 लाख से 1 करोड़ तक कीमत होने का दावा

स्थानीय जानकारों के अनुसार हंसराज पर्वत से मिलने वाले कुछ रत्नों की एंटीक वैल्यू काफी अधिक हो सकती है। उनका दावा है कि जिन रत्नों को स्थानीय स्तर पर 1 लाख से 5 लाख रुपये तक में खरीदा जाता है, उनकी कीमत विदेशों में 50 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

कुछ जानकार इन पत्थरों की उम्र 4,000 से 5,000 साल तक बताते हैं, जबकि कुछ दावों में इससे भी अधिक पुराना होने की बात कही गई है। किसी विशेष रत्न की वास्तविक उम्र और कीमत निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञ मूल्यांकन जरूरी है।

ग्रामीण अशोक कुमार ने बताया बारिश के साथ बहकर आते हैं रत्न

हसरा गांव के ग्रामीण अशोक कुमार के मुताबिक, हंसराज पर्वत के आसपास बारिश के पानी के साथ मनिया, मूंगा, हीरा और मोती जैसे पत्थर नीचे की तरफ आते हैं। उनका कहना है कि इस वर्ष भी कई लोगों को बारिश के दौरान रत्न मिले हैं। कुछ रत्नों की कीमत 1 लाख और 2 लाख रुपये तक लगी है, जबकि कुछ की बिक्री 5 लाख रुपये तक होने का दावा किया गया है।

अशोक कुमार के मुताबिक, केवल हसरा गांव ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों के लोग भी बारिश के दौरान खेतों और जमीन पर इन पत्थरों की तलाश करते हैं। उनका दावा है कि सबसे ज्यादा फायदा हसरा गांव के लोगों को होता है।

शैलेंद्र कुमार: बारिश में खेतों तक पहुंच जाते हैं रत्न

गांव के युवा शैलेंद्र कुमार बताते हैं कि हंसराज पहाड़ की खासियत यह है कि बारिश के मौसम में अलग-अलग तरह के मनिया, मोती और अन्य अनमोल पत्थर जमीन पर दिखाई देने लगते हैं। उनके अनुसार बारिश के पानी के बहाव के साथ ये पत्थर पहाड़ से नीचे आते हैं और खेतों या गांव की जमीन पर पहुंच जाते हैं। बारिश के बाद ग्रामीण इन्हें तलाशते हैं।

शैलेंद्र कुमार का कहना है कि उन्हें भी चार-पांच ऐसे रत्न मिल चुके हैं, जिन्हें वह बेच चुके हैं। उनके मुताबिक इस वर्ष भी इलाके में कई लोगों को रत्न मिले हैं और कुछ की कीमत लाखों रुपये तक पहुंची है। उनका दावा है कि इस साल बारिश के मौसम में अब तक करीब 10 लाख रुपये तक के रत्नों की बिक्री इलाके में हो चुकी है। कुछ ग्रामीण ऐसे भी हैं जिन्होंने रत्न मिलने के बावजूद उन्हें अभी बेचने के बजाय संभालकर रखा है।

रत्न बेचकर घर बनाने से लेकर इलाज और क्रियाकर्म तक में इस्तेमाल

ग्रामीणों के मुताबिक, रत्नों की बिक्री से मिली रकम का इस्तेमाल लोग अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने में करते हैं। किसी ने इससे घर बनाया तो किसी ने बाइक खरीदी। कुछ लोगों ने परिवार की जरूरी जरूरतों और इलाज में भी इस पैसे का इस्तेमाल किया।

ग्रामीणों का कहना है कि पहले आर्थिक रूप से कमजोर माने जाने वाले परिवारों के लिए बारिश के मौसम में मिलने वाला कोई रत्न अचानक बड़ी आर्थिक मदद बन जाता है। इसी वजह से स्थानीय लोग हंसराज पर्वत को ‘तकदीर बदलने वाला पहाड़’ और ‘लखपति बनाने वाला पहाड़’ तक कहते हैं।

मनिया और ‘आयुर्वेद’ की ज्यादा चर्चा

स्थानीय लोगों और जानकारों के अनुसार हंसराज पर्वत के आसपास मनिया और ‘आयुर्वेद’ नाम से बताए जाने वाले पत्थर ज्यादा मिलते हैं। इनके अलावा मूंगा, मोती और अन्य रत्न मिलने का भी दावा किया जाता है। जानकारों का कहना है कि कुछ प्राकृतिक पत्थरों की बाजार में कीमत उनकी दुर्लभता और पुरातनता के कारण बढ़ सकती है। ग्रामीणों के बीच यह भी मान्यता है कि इनमें से कुछ पत्थर हजारों वर्ष पुराने हैं।

हालांकि, किसी पत्थर को प्राकृतिक रत्न, प्राचीन वस्तु या किसी विशेष खनिज के रूप में प्रमाणित करने के लिए विशेषज्ञ जांच आवश्यक है।

धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़े हैं ये रत्न

स्थानीय मान्यताओं में इन रत्नों का धार्मिक महत्व भी बताया जाता है। ग्रामीणों और कुछ जानकारों के अनुसार अलग-अलग रंगों के रत्नों को अलग-अलग ग्रहों से जोड़कर देखा जाता है।मान्यता के अनुसार हरे रंग के रत्न को बुध, लाल रंग को सूर्य या मंगल और सफेद रंग के मोती को चंद्रमा से जोड़ा जाता है। मूंगा को मंगल ग्रह से और मोती को मानसिक शांति से जोड़ने की धार्मिक मान्यता है।

इन रत्नों का इस्तेमाल पूजा-पाठ और आभूषणों में भी किया जाता है। हालांकि, ग्रहों या स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव संबंधी दावों का वैज्ञानिक प्रमाण अलग विषय है।

हंसराज पर्वत का इतिहास राजा-महाराजाओं से जोड़ते हैं ग्रामीण

हंसराज पर्वत को लेकर स्थानीय स्तर पर कई ऐतिहासिक और लोककथाएं भी प्रचलित हैं। ग्रामीण इसे बिंबिसार और प्राचीन मगध क्षेत्र से जुड़ा बताते हैं। यह इलाका बौद्ध सर्किट से भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार सोनपुर के राजा ने कभी इस पहाड़ पर भगवान भोलेनाथ का मंदिर बनवाया था। पहाड़ पर पुराने समय के राजाओं से जुड़े अवशेष और कहानियों का भी जिक्र किया जाता है।

गांव के बुजुर्ग बृज कृष्ण मांझी का कहना है कि स्थानीय मान्यता के अनुसार इस पहाड़ी पर सोनपुर के राजा का अधिकार था। वह पहाड़ के आसपास पुराने राजघराने और रानी घाट से जुड़ी कहानियां भी बताते हैं। उनके अनुसार हर साल बरसात के मौसम में मिलने वाले रत्नों को गांव की खुशहाली से जोड़ा जाता है। इन ऐतिहासिक दावों की भी पुरातात्विक या आधिकारिक पुष्टि अलग से जरूरी है।

हर साल बारिश के साथ शुरू होती है रत्नों की तलाश

हंसराज पर्वत और हसरा गांव की कहानी प्राकृतिक घटनाओं, धार्मिक आस्था और ग्रामीणों की उम्मीदों का अनोखा मेल है। मानसून आते ही जहां दूसरे इलाकों में बारिश को खेती के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, वहीं हसरा और आसपास के गांवों में लोग बारिश के साथ जमीन पर आने वाले कथित रत्नों की तलाश भी शुरू कर देते हैं।

किसी के हाथ खाली रहते हैं तो किसी को ऐसा पत्थर मिल जाता है जिसकी कीमत उसके लिए पूरे साल की कमाई से भी ज्यादा हो सकती है। यही वजह है कि ग्रामीणों के बीच हंसराज पर्वत को ‘लखपति बनाने वाला पहाड़’ कहा जाने लगा है।

हालांकि, रत्नों की वास्तविक पहचान, उम्र, प्राकृतिक उत्पत्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बताई जा रही कीमतों की पुष्टि वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ जांच से ही संभव है। इसके बावजूद स्थानीय ग्रामीणों के लिए हंसराज पर्वत केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि आस्था, उम्मीद और बदलती आर्थिक स्थिति का प्रतीक बन चुका है।

गया से रिपोर्टर : आशीष कुमार

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