NEWS PR डेस्क: बिहार के सीमावर्ती जिले किशनगंज में सेना के प्रस्तावित नए सैन्य स्टेशन के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया के बीच बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-बिक्री ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला ठाकुरगंज प्रखंड के भेलागुड़ी मौजा का है, जो रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब स्थित है। दस्तावेजों के अनुसार, सेना के लिए 189.68 एकड़ निजी भूमि अधिग्रहित करने की प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही थी। इसी दौरान प्रस्तावित क्षेत्र में 70.91 एकड़ से अधिक जमीन अलग-अलग बाहरी खरीदारों के नाम रजिस्ट्री होने की बात सामने आई है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास है भेलागुड़ी मौजा
किशनगंज के ठाकुरगंज क्षेत्र का भेलागुड़ी मौजा भौगोलिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यह इलाका भारत के मुख्य भू-भाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब है। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के नजदीक होने के कारण इस क्षेत्र का सामरिक महत्व भी काफी अधिक है। इसी इलाके में सेना के नए सैन्य स्टेशन के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी।
पहले शुरू हुई सैन्य स्टेशन की प्रक्रिया, फिर तेजी से हुई जमीन की रजिस्ट्री
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, सेना के प्रस्तावित सैन्य स्टेशन को लेकर सरकारी प्रक्रिया 1 अक्टूबर 2025 से शुरू हुई। इसके बाद 7 नवंबर 2025 को चिह्नित जमीन के संयुक्त सर्वेक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
फिर 21 जनवरी 2026 को किशनगंज जिला प्रशासन की ओर से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को लेकर आधिकारिक कार्रवाई की गई। 10 फरवरी 2026 तक प्रस्तावित 189.68 एकड़ भूमि के प्लॉट संबंधी पत्राचार का अंतिम चरण चल रहा था। इसके ठीक अगले दिन यानी 11 फरवरी 2026 से भेलागुड़ी मौजा में जमीन की बड़े पैमाने पर रजिस्ट्री शुरू होने की बात सामने आई।
16 रजिस्ट्री में 70 एकड़ से ज्यादा जमीन की खरीद
रिपोर्ट के अनुसार, अब तक सामने आए 16 रजिस्टर्ड दस्तावेजों में कुल 70 एकड़ 91 डिसमिल से अधिक जमीन की खरीद-बिक्री का विवरण सामने आया है। इनमें कई बड़े भूखंड शामिल हैं।
28 मार्च 2026 को एक ही दिन में कई बड़े जमीन सौदों की रजिस्ट्री होने का भी उल्लेख है। दस्तावेजों के आधार पर यह सवाल उठ रहा है कि सेना के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान उसी इलाके में अचानक इतनी बड़ी मात्रा में जमीन की खरीदारी क्यों हुई।
सात बाहरी खरीदारों के नाम हुई जमीन की रजिस्ट्री
सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, प्रस्तावित सैन्य स्टेशन क्षेत्र की करीब 70.91 एकड़ जमीन सात बाहरी खरीदारों के नाम दर्ज हुई। रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश और दिल्ली के खरीदारों के नाम सामने आने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में दर्ज प्रमुख खरीददारों में सुलेमान खान के नाम करीब 13.12 एकड़, मोहम्मद शमीम के नाम 11.72 एकड़, मोहम्मद अनस के नाम 9.05 एकड़ और तश्कील अहमद के नाम 7.35 एकड़ जमीन दर्ज होने की बात कही गई है।
राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का नाम भी आया सामने
रजिस्ट्री दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान इमरान प्रतापगढ़ी नाम के खरीदार का उल्लेख भी सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ दस्तावेजों में खरीदार के पेशे के कॉलम में “खेती वगैरह एवं पार्लियामेंट मेंबर” लिखा गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दस्तावेजों में दर्ज नाम और राज्यसभा सदस्य के सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर समानता को लेकर सवाल उठे हैं हालांकि, किसी व्यक्ति की पहचान या दस्तावेजों के संबंध में अंतिम आधिकारिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र प्रशासनिक जांच आवश्यक होगी।
क्या अधिग्रहण की जानकारी पहले ही लीक हो गई थी?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जमीन की खरीदारी के समय को लेकर उठ रहा है। सेना के लिए जमीन अधिग्रहण की सरकारी प्रक्रिया और बड़े पैमाने पर हुई निजी खरीदारी की समय-सीमा एक-दूसरे के काफी करीब दिखाई देती है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या संभावित भूमि अधिग्रहण और उससे मिलने वाले मुआवजे की जानकारी किसी तरह पहले ही कुछ लोगों तक पहुंच गई थी? या फिर यह केवल सामान्य निवेश और जमीन खरीद-बिक्री का मामला था? उपलब्ध दस्तावेजों से इन सवालों का स्पष्ट जवाब फिलहाल सामने नहीं आया है।
अगर खरीदी गई जमीन अधिग्रहण क्षेत्र में आई तो मुआवजे पर उठेंगे सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू संभावित मुआवजे से भी जुड़ा हुआ है। यदि हाल के दिनों में खरीदी गई जमीन सेना के लिए प्रस्तावित 189.68 एकड़ भूमि अधिग्रहण क्षेत्र का हिस्सा पाई जाती है, तो जमीन मालिकों को सरकारी नियमों के अनुसार मुआवजा मिलने का मामला सामने आ सकता है।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि अधिग्रहण की स्थिति में जमीन का वास्तविक लाभ किसे मिलेगा और क्या सरकारी प्रक्रिया के दौरान हुई इन रजिस्ट्रियों की समीक्षा की जाएगी हालांकि, इन सभी सवालों का अंतिम जवाब प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र की अंतिम सूची सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
अंतिम खाता-खेसरा सूची से साफ हो सकती है पूरी तस्वीर
विशेषज्ञों और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों के बीच अब नजर प्रशासन और रक्षा विभाग की अंतिम खाता-खेसरा सूची पर है। यदि सेना के लिए प्रस्तावित 189.68 एकड़ भूमि की अंतिम सूची सार्वजनिक होती है और उसका हाल में हुई रजिस्ट्रियों से मिलान किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि खरीदी गई जमीन वास्तव में प्रस्तावित अधिग्रहण क्षेत्र का हिस्सा है या नहीं।
फिलहाल, सीमांचल के इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके में सरकारी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के बीच हुई बड़े पैमाने की जमीन खरीद-बिक्री ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की वास्तविक स्थिति अंतिम प्रशासनिक रिकॉर्ड और किसी भी संभावित आधिकारिक जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।