बिहार सरकार का बड़ा कदम: दाखिल-खारिज प्रक्रिया में अब होगी पूरी पारदर्शिता

Jyoti Sinha
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बिहार की राजनीति केवल विधानसभा की बहसों या सड़कों पर आंदोलनों से तय नहीं होती। इसकी असली जड़ें उस ज़मीन में होती हैं, जहां किसान की मेहनत और भू-स्वामियों की उम्मीदें मिलकर रोज़गार और जीवन का आधार तैयार करती हैं। लेकिन जब उसी ज़मीन के कागज़ात—दाखिल-खारिज जैसी प्रक्रियाएँ—मनमानी और अपारदर्शिता की भेंट चढ़ जाएँ, तो लोकतंत्र का भरोसा कमजोर होने लगता है।

इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने निर्णायक पहल की है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब दाखिल-खारिज के मामलों में बिना कारण बताए कोई भी आवेदन अस्वीकृत नहीं किया जा सकेगा। हाल के महीनों में बड़ी संख्या में ऐसी शिकायतें सामने आई थीं कि किसानों और रैयतों के कागज़ात बिना ठोस कारण बताए रद्द कर दिए जा रहे थे। यह स्थिति न सिर्फ लापरवाही का प्रतीक थी, बल्कि आम जनता के अधिकारों से खिलवाड़ भी।अब नियम के तहत हर अस्वीकृति का लिखित कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा और उसकी प्रति सीधे आवेदनकर्ता को सौंपी जाएगी। यह आदेश केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि उन किसानों और भूमिपुत्रों के संघर्ष का उत्तर है, जो सालों से न्याय की राह देख रहे थे।सोचिए, जब कोई किसान महीनों तक चक्कर लगाने के बाद सिर्फ “अस्वीकृत” की मुहर पाता है, तो यह उसके आत्मसम्मान पर चोट होती है।

सरकार का यह कदम इसी पीड़ा को कम करने का प्रयास है।हर ज़िला पदाधिकारी को साफ़ निर्देश दिए गए हैं कि आदेश का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित करें। अगर शिकायतें जारी रहीं, तो संबंधित अंचलाधिकारी पर विभागीय कार्रवाई होगी। यह संदेश उस पुरानी “चलता है” वाली कार्यसंस्कृति के खिलाफ़ सख़्त कदम माना जा रहा है।वर्तमान में राज्यभर के अंचल कार्यालयों में दाखिल-खारिज से जुड़े करीब 50,000 आवेदन लंबित हैं। इनमें से कई मामलों को दाखिल किए 75 दिन से ज़्यादा समय बीत चुका है। यह आंकड़ा प्रशासनिक सुस्ती का खुला सबूत है।राजनीतिक तौर पर देखा जाए, तो यह कदम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “सुशासन” की छवि को मजबूत करने का प्रयास है। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी छिपाने की कोशिश बता सकता है, मगर अगर आदेश का सही पालन हुआ, तो लाखों भूमि स्वामियों को वास्तविक राहत मिलेगी।असल में ज़मीन केवल एक टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि व्यक्ति की पहचान, परिश्रम और पीढ़ियों की धरोहर है। ऐसे में दाखिल-खारिज प्रक्रिया में पारदर्शिता स्थापित करना प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक, लोकतांत्रिक न्याय की बहाली है।

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