ई-रिक्शा से कॉमनवेल्थ पोडियम तक: बिहार के झंडू कुमार ने संघर्ष को बनाया ताकत, जीता ऐतिहासिक कांस्य पदक

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: नालंदा/ग्लासगो,25 जुलाई। कभी परिवार का पेट पालने के लिए ई-रिक्शा चलाने वाले बिहार के नालंदा निवासी झंडू कुमार ने अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारत का तिरंगा बुलंद कर दिया है। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में 190 किलोग्राम वजन उठाकर उन्होंने कांस्य पदक जीतते हुए भारत को प्रतियोगिता का पहला पदक दिलाया। यह उपलब्धि केवल एक मेडल नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और अटूट हौसले की मिसाल बन गई है।

28 वर्षीय झंडू कुमार का जीवन आसान नहीं रहा। महज पांच वर्ष की उम्र में पोलियो ने उनके शरीर को प्रभावित कर दिया, लेकिन उनके इरादों को नहीं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे झंडू के घर की रोजी-रोटी हरनौत बाजार में सब्जी बेचकर चलती थी। कोविड-19 महामारी के दौरान ओवरब्रिज निर्माण की वजह से परिवार की दुकान बंद हो गई, जिसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर परिवार की जिम्मेदारी संभाली।

दिन में सब्जी का कारोबार और ई-रिक्शा चलाने के बाद शाम को घंटों जिम में पसीना बहाना उनकी दिनचर्या बन गई थी। सीमित आय में घर चलाना ही मुश्किल था, जबकि एक खिलाड़ी के लिए जरूरी पोषण और सप्लीमेंट का खर्च अलग चुनौती था। इसके बावजूद उन्होंने अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा।

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साल 2023 में राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए झंडू ने अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया। प्रतियोगिता में वे एक भी सफल लिफ्ट नहीं लगा सके, लेकिन इसी टूर्नामेंट ने उनकी किस्मत बदल दी। उनकी लगन और मेहनत ने भारत के पूर्व पैरा पावरलिफ्टर एवं राष्ट्रीय कोच राजिंदर सिंह राहेलू का ध्यान खींचा। इसके बाद उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के गांधीनगर स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रशिक्षण का अवसर मिला।

बेहतर प्रशिक्षण मिलने के बाद झंडू ने लगातार सफलता की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी। उन्होंने खेलो इंडिया पैरा गेम्स में रजत पदक जीता, एशिया-ओशिनिया ओपन पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में इतिहास रच दिया।

ग्लासगो में हुए फाइनल मुकाबले में नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने स्वर्ण और इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने रजत पदक जीता, जबकि झंडू कुमार ने 130.9 अंक के साथ तीसरा स्थान हासिल कर भारत की झोली में कांस्य पदक डाला। स्वर्ण पदक से बेहद मामूली अंतर से चूकने के बावजूद उनका प्रदर्शन पूरे देश के लिए गर्व का विषय बन गया।

झंडू की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद नालंदा के उनके पैतृक गांव में उत्सव जैसा माहौल है। परिवार और ग्रामीणों ने मिठाइयां बांटकर खुशी मनाई। पिता रामानंद पासवान ने बताया कि बेटे का मुकाबला देखने के लिए वे पूरी रात जागते रहे। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण है। मां कमला देवी ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने हमेशा बेटे को देश का नाम रोशन करने का आशीर्वाद दिया था और आज उनका सपना सच हो गया।

झंडू कुमार की कहानी इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियां किसी इंसान के सपनों को नहीं रोक सकतीं। दृढ़ संकल्प, मेहनत और सही अवसर मिलने पर संघर्ष ही सफलता की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। आज झंडू केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुके हैं।

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