नेपाल की बारिश बनी आफत, गंगा उफान पर – गनियारी टोला जलमग्न, लोग पलायन को मजबूर

Jyoti Sinha
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नेपाल में लगातार हो रही भारी बारिश का असर अब बिहार में साफ दिखने लगा है। राज्य से होकर गुजरने वाली तमाम नदियां उफान पर हैं, खासकर गंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे अधिक असर देसरी प्रखंड के गनियारी टोला में देखा जा रहा है, जहां हालात बाढ़ जैसे बन चुके हैं।

गांव की मुख्य सड़क बनी नदी, संपर्क टूटा

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गंगा नदी के किनारे बसे गनियारी टोला की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ रही है। महज एक किलोमीटर की दूरी पर बह रही गंगा का पानी अब गांव तक पहुंच गया है। गांव की मुख्य संपर्क सड़क पर करीब 8 फीट तक पानी चढ़ चुका है, जिससे लोगों का आना-जाना पूरी तरह बंद हो गया है। हालात इतने खराब हैं कि लोग गांव छोड़कर ऊंचे और सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं।

65 परिवार संकट में, फसलें और चारा सब तबाह

गांव में करीब 65 परिवार रहते हैं, जिनका जीवन पूरी तरह खेती और पशुपालन पर निर्भर है। लेकिन गंगा की बढ़ती धार ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में खड़ी फसलें डूब गई हैं, चारा बह गया है और अब पशुओं को खिलाने तक के लिए कुछ नहीं बचा। मजबूरी में किसान अपने मवेशियों को ऊंचे क्षेत्रों में ले जाकर टिका रहे हैं, लेकिन वहां भी सुविधाओं का अभाव है – न चारा है, न रहने की व्यवस्था।

स्कूल बंद, इलाज ठप – गंगा ने गांव को घेरा

गांव के चारों ओर गंगा का पानी फैल चुका है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, और स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह ठप हो चुकी हैं। सड़क डूब जाने की वजह से कोई भी वाहन गांव तक नहीं पहुंच पा रहा। हालात इतने गंभीर हैं कि गांव अब पूरी तरह बाहरी संपर्क से कट चुका है।

रामदौली सूरदास घाट पर भी संकट

गनियारी टोला से सटे बिदुपुर प्रखंड के रामदौली सूरदास घाट की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां भी बीते तीन दिनों में गंगा के जलस्तर में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। अब नदी सड़क से सट गई है और आसपास के खेत पानी में डूब चुके हैं। किसान यहां भी फसलों और चारे के नुकसान से जूझ रहे हैं।

राहत का इंतजार, लेकिन प्रशासन नदारद

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से अविलंब राहत और पुनर्वास की मांग की है, लेकिन अब तक कोई स्थायी राहत शिविर नहीं बनाया गया है। लोग अस्थायी तौर पर स्कूलों या खुले आसमान के नीचे शरण ले रहे हैं।

गंगा की इस तबाही ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि तटवर्ती गांवों में रहने वाले किसान और पशुपालक हर साल प्रकृति से जूझने को मजबूर हैं। उनके लिए यह सिर्फ बाढ़ नहीं, बल्कि जीने-मरने का सवाल बन चुका है।

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