राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस MLA सुरेंद्र प्रसाद ने क्यों नहीं डाला वोट? खुद बताई वजह

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन को बड़ा झटका तब लगा जब उसके चार विधायक मतदान से दूर रहे। कांग्रेस विधायक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने अब खुद सामने आकर वोट नहीं देने की वजह स्पष्ट की है।

सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा कि वे महागठबंधन के उम्मीदवार से संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने किसी के पक्ष में मतदान नहीं करने का फैसला लिया। उन्होंने लिखा, “एक सीट का मौका था महागठबंधन के पास तो दीपक यादव जी से बेहतर उम्मीदवार कौन हो सकता था, वह भी नहीं तो मुकेश सहनी जी को ही, लेकिन उन्हें मौका ना देकर ऐसे वर्ग के व्यक्ति को उम्मीदवार बना दिया गया जिसका जनाधार महागठबंधन के खिलाफ है। मैं NDA का साथ दे नहीं सकता हूं और राजद ने उम्मीदवार गलत चुना तो मैंने वोट नहीं देना ही बेहतर समझा।”

अपने ऊपर लग रहे आरोपों को लेकर भी उन्होंने पोस्ट में जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “रही बात मुझपर आरोप लगाने की, तो मुख्यमंत्री के सबसे चहेते सीट पर हमनें पूरे सरकारी तंत्र को हराकर विधानसभा चुनाव में जीत हासिल किया था और जनता के आशीर्वाद का कर्ज पूरे बिहार में सबसे तेज गति से विकास कार्यों के द्वारा चुकता कर रहा हूं। विरोधी जब बराबरी नहीं कर पाएगा तो बदनाम ही करेगा। आशा है जनता दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए मेरे इस त्याग और समर्पण की भावना को समझेगी और विरोधियों के झांसे में नहीं आएगी।”

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पश्चिम चंपारण के वाल्मीकिनगर से पहली बार विधायक बने सुरेंद्र प्रसाद का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा है। वे पहले एनडीए के साथ भी चुनाव लड़ चुके हैं। 2015 में उन्होंने RLSP के टिकट पर चुनाव लड़ा था, जबकि 2025 में जदयू उम्मीदवार धीरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ रिंकू सिंह को 1675 वोटों से हराकर विधानसभा पहुंचे।

बताया जा रहा है कि महागठबंधन के चार विधायकों की गैरहाजिरी ने चुनावी गणित बिगाड़ दिया, जिससे राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह की राह कठिन हो गई। कांग्रेस के तीन विधायक—सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा, मनोज विश्वास और मनोहर प्रसाद सिंह—ने मतदान नहीं किया, जबकि आरजेडी के फैसल रहमान भी वोट डालने नहीं पहुंचे।

इसका सीधा असर परिणामों पर पड़ा और राज्यसभा की पांचों सीटों पर एनडीए ने जीत दर्ज कर ली। राजनीतिक गलियारों में अब महागठबंधन के भीतर समन्वय और उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

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