क्या RCP सिंह की होगी जदयू में वापसी? फिर दिखेगा नीतीश कुमार का ‘मैजिक’!

Asha Rai

NEWS PR डेस्क: बिहार की राजनीति में एक कहावत लंबे समय से चलती रही है—नीतीश कुमार से जो दूर जाता है, वह कभी न कभी लौटकर जरूर आता है। मई 2013 की ‘सेवा यात्रा’ के दौरान खुद नीतीश कुमार ने कहा था कि उनमें एक ऐसा गुण है कि जो साथ छोड़ते हैं, वे वापस उनके पास लौट आते हैं। पिछले डेढ़ दशक की राजनीति देखें तो यह बात कई बार सच साबित हुई है।

क्या आरसीपी सिंह की वापसी संभव?

हाल ही में कुर्मी समाज के एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार मुख्य अतिथि थे। उसी कार्यक्रम में आरसीपी सिंह भी मौजूद थे, हालांकि दोनों के बीच कोई औपचारिक मुलाकात नहीं हुई। लेकिन कार्यक्रम के बाद मीडिया से बातचीत में आरसीपी सिंह ने कहा कि चार साल से आमना-सामना भले नहीं हुआ हो, रिश्तों में दूरी नहीं आई है और यह संबंध स्थायी है।
ज्ञात हो कि आरसीपी सिंह 2022 में जदयू से अलग हुए थे। उससे पहले वे केंद्र की राजनीति में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं।

राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा तेज है कि क्या यह बयान वापसी का संकेत है?

Rajiv Ranjan Singh: विद्रोह से वापसी तक

2009 में मुंगेर से जदयू सांसद चुने गए ललन सिंह ने पार्टी में रहते हुए ही नीतीश कुमार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, 2010 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए प्रचार किया और नीतीश पर गंभीर आरोप लगाए।

स्थिति इतनी बिगड़ी कि जदयू ने उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 2013 में ललन सिंह ने सुलह के संकेत दिए। पार्टी ने भी नरमी दिखाई और वे फिर से नीतीश खेमे में लौट आए। आज वे जदयू के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं।

Upendra Kushwaha: कई बार दूरी, फिर करीबियां

उपेन्द्र कुशवाहा का राजनीतिक सफर भी नीतीश कुमार से जुड़ता और टूटता रहा है। वे कई बार अलग हुए, नई राह पकड़ी, लेकिन अंततः राजनीतिक समीकरणों ने उन्हें फिर एनडीए और नीतीश के करीब ला दिया।
आज वे अपनी अलग पार्टी के साथ सक्रिय हैं, लेकिन उनके राजनीतिक उत्थान में जदयू और नीतीश की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Arun Kumar: कटु बयान से पुनः साथ

पूर्व सांसद अरुण कुमार ने 2015 में नीतीश कुमार के खिलाफ बेहद तीखे बयान दिए थे। संबंध लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले वे अपने पुत्र के साथ जदयू में शामिल हो गए।
आज उनके पुत्र ऋतुराज कुमार जदयू के विधायक हैं। यह उदाहरण भी बताता है कि नीतीश कुमार राजनीतिक कटुता को भुलाकर पुराने साथियों को मौका देने में पीछे नहीं रहते।

क्या अब आरसीपी सिंह की बारी?

इतिहास गवाह है कि नीतीश कुमार ने कड़वे बयान, राजनीतिक विद्रोह और सार्वजनिक मतभेदों के बावजूद कई नेताओं को दोबारा अपनाया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी भी संभव है?

राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, सिर्फ स्थायी हित होते हैं। यदि राजनीतिक समीकरण अनुकूल हुए, तो ‘आंतरिक गुण’ एक बार फिर चर्चा में आ सकता है।

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