बिहार की राजनीति में संतुलन की चाल: कुशवाहा नेतृत्व, बीजेपी की रणनीति और सम्राट चौधरी को ‘अभयदान’

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: खरमास समाप्त हो चुका है, चूड़ा-दही भोज की गूंज भी अब धीमी पड़ने लगी है और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) में टूट की चर्चाओं पर फिलहाल विराम लग गया है। इसी सियासी शांति के बीच बिहार की राजनीति में एक बड़ा संदेश भी गया है, उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी को न केवल राहत मिली है, बल्कि बीजेपी ने उन्हें लेकर अपनी दीर्घकालिक रणनीति भी स्पष्ट कर दी है।

बीते कई दिनों से चल रही राजनीतिक उठापटक के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने बेहद सधी हुई चाल चली। पार्टी के भीतर असंतोष की खबरों के बीच उन्होंने अपने दो प्रमुख विधायकों को मना लिया। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि यह ‘मनाना’ दरअसल बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के संकेतों के बाद संभव हो सका। नाराज़ विधायक वापस उपेंद्र कुशवाहा के पाले में लौट आए और RLM में टूट की आशंकाएं फिलहाल टल गईं।

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से बिहार में सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधने की कोशिश में है। नीतीश कुमार की अनुपस्थिति या सीमित भूमिका के दौर में बीजेपी की रणनीति ‘लव–कुश’ यानी कुर्मी–कोइरी वोट बैंक को अपने पाले में पूरी मजबूती से लाने की रही है। इसी रणनीति के तहत सम्राट चौधरी को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं, पहले उपमुख्यमंत्री और अब उपमुख्यमंत्री के साथ राज्य के गृहमंत्री के रूप में।

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बीजेपी का यह प्रयास रहा है कि जैसे यादव समाज में लालू प्रसाद यादव की निर्विवाद स्वीकार्यता रही है और तमाम प्रयासों के बावजूद अन्य नेता उस स्थान को नहीं ले सके, उसी तरह पासवान वोटों पर चिराग पासवान की एकतरफा पकड़ मानी जाती है। कुर्मी वोट लंबे समय तक नीतीश कुमार के साथ खड़ा रहा है। अब बीजेपी चाहती है कि कुशवाहा समाज का समर्थन भी भविष्य में पूरी तरह उसके साथ खड़ा दिखाई दे।

कुछ समय पहले तक कुशवाहा समाज में उपेंद्र कुशवाहा को सबसे बड़ा और स्वाभाविक नेता माना जाता था। हालांकि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने समीकरणों में बदलाव किया है। लगातार दूसरी बार उपमुख्यमंत्री और पहली बार गृहमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी की स्वीकार्यता कुशवाहा समाज में तेज़ी से बढ़ी है। आज बड़ी संख्या में लोग उन्हें समाज का प्रमुख नेता मानने लगे हैं। इसके बावजूद उपेंद्र कुशवाहा के प्रति सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव अब भी कायम है।

यही वह नाजुक बिंदु है, जहां बीजेपी को बेहद संतुलित कदम उठाने की ज़रूरत थी। अगर RLM के विधायकों को तोड़ा जाता, तो यह संदेश जाता कि बीजेपी कुशवाहा नेतृत्व को कमजोर या खत्म करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष को भी यह कहने का मौका मिल जाता कि आज उपेंद्र कुशवाहा को किनारे किया गया है, कल यही हश्र सम्राट चौधरी का भी हो सकता है। यह धारणा बीजेपी की दीर्घकालिक रणनीति के बिल्कुल विपरीत जाती।

खासतौर पर तब, जब बिहार में पहले से ही भारी बहुमत की सरकार चल रही है और तात्कालिक राजनीतिक लाभ की कोई मजबूरी नहीं थी। ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने राजनीतिक परिपक्वता दिखाई। असंतुष्ट विधायकों को समझा-बुझाकर वापस उपेंद्र कुशवाहा के पास भेजा गया, जिससे न केवल RLM की साख बची, बल्कि कुशवाहा समाज में यह संदेश भी गया कि बीजेपी उनके नेतृत्व को सम्मान देती है।

इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि सम्राट चौधरी को बीजेपी के भीतर आगे बढ़ते रहने का ‘अभयदान’ यानि सुरक्षा कवच मिल गया। पार्टी ने साफ कर दिया कि सामाजिक संतुलन और नेतृत्व के क्रमिक विकास की नीति पर चल रही है। बिहार की राजनीति में यह चाल भले ही शांत दिखे, लेकिन इसके दूरगामी असर तय माने जा रहे हैं।

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