नाबालिगों के मोबाइल इस्तेमाल पर सख्ती की तैयारी, नीतीश सरकार ला सकती है नया कानून

Neha Nanhe

NEWS PR डेस्क : बिहार विधान सभा में बच्चों और किशोरों के बीच तेजी से बढ़ रहे स्क्रीन टाइम के मुद्दे पर गंभीर मंथन हुआ। चर्चा के दौरान सदस्यों ने कम उम्र में मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से पढ़ाई, व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई।

बहस के बाद राज्य सरकार ने संकेत दिए कि बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को सीमित और व्यवस्थित करने के लिए एक नई नीति तैयार की जाएगी। प्रस्तावित नीति में स्कूलों में मोबाइल उपयोग के नियम, अभिभावकों की जिम्मेदारी और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।

सरकार का मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग जरूरी है, ताकि बच्चे डिजिटल दुनिया का लाभ भी उठा सकें और उसके दुष्प्रभावों से भी सुरक्षित रह सकें।बिहार में बच्चों की बढ़ती मोबाइल लत पर सरकार सख्त, स्क्रीन टाइम नियंत्रण के लिए बनेगी व्यापक नीति

बिहार में बच्चों और किशोरों के बीच तेजी से बढ़ती मोबाइल की आदत को लेकर सरकार अब सक्रिय मोड में आ गई है। विधानसभा में इस मुद्दे पर गहन चर्चा के बाद राज्य सरकार ने इसे “अदृश्य महामारी” की तरह गंभीर चुनौती माना है और स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए सख्त और बहुस्तरीय नीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

सदन में उठा मुद्दा

समृधि वर्मा , जो पश्चिम चंपारण के सिकटा से जदयू विधायक हैं, ने सदन में कहा कि ग्रामीण इलाकों तक मोबाइल की पहुंच ने बच्चों की दिनचर्या बदल दी है। बच्चे घंटों यूट्यूब, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में डूबे रहते हैं। लगातार रील्स देखने और स्क्रॉलिंग की आदत से उनकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सरकार से आयु-आधारित स्क्रीन टाइम सीमा तय करने और इस विषय पर आईटी, शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त प्रयास की मांग की।

बहुविभागीय रणनीति की तैयारी

राज्य की आईटी मंत्री श्रेयसी सिंह ने माना कि बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बिहार भी बहुविभागीय नीति अपनाएगा।

सरकार ने बताया कि बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान से विशेषज्ञ सलाह मांगी गई है। रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित विभाग मिलकर स्पष्ट मानक और गाइडलाइन तैयार करेंगे। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी आश्वस्त किया कि इस दिशा में ठोस और व्यापक नीति बनाई जाएगी।

‘अदृश्य महामारी’ की चेतावनी

समृद्ध वर्मा ने स्क्रीन एडिक्शन को “अदृश्य महामारी” बताते हुए कहा कि रील्स और छोटे वीडियो से मिलने वाला डोपामाइन प्रभाव बच्चों की एकाग्रता कम कर रहा है और वास्तविक जीवन उन्हें नीरस लगने लगा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार एआई जैसी उन्नत तकनीक बच्चों को सिखाने की योजना बना रही है, तो डिजिटल लत से बचाने के उपाय भी समान रूप से जरूरी हैं। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट के रूप में देखने की मांग की।

पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल हाइजीन’ का सुझाव

विधायक ने सुझाव दिया कि स्कूल पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल हाइजीन’ को शामिल किया जाए। साथ ही जिला स्तर पर एडिक्शन क्लीनिक खोले जाएं और जीविका दीदियों के माध्यम से गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाया जाए, ताकि अभिभावकों और बच्चों दोनों को संतुलित डिजिटल उपयोग के प्रति जागरूक किया जा सके।

सरकार का मानना है कि तकनीक को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है, बल्कि उसका संतुलित और सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करना ही इस नीति का मुख्य उद्देश्य होगा।

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