NEWS PR डेस्क: ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गाँव अचानक सुर्खियों में आ गया है। बाराबंकी ज़िले में स्थित किंतूर गाँव इन दिनों मीडिया और लोगों की चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
यह गाँव लखनऊ-फ़ैज़ाबाद हाईवे पर सफ़दरगंज से कुछ किलोमीटर अंदर स्थित है। रमज़ान का महीना होने के कारण यहाँ दिन में कम ही लोग बाहर दिखाई देते हैं। ख़ामेनेई की मौत की खबर के बाद इस गाँव को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है।
दरअसल यह दावा किया जाता है कि ईरान के पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रुहोल्लाह मुसावी ख़ुमैनी के पूर्वज कभी इसी गाँव में रहते थे।स्थानीय लोगों के मुताबिक पहले यहाँ शिया सादात यानी सैयद समुदाय की बड़ी आबादी हुआ करती थी।
गाँव के निवासी निहाल काज़मी का कहना है कि कभी यहाँ करीब 500 शिया परिवार रहते थे।लेकिन समय के साथ लोगों के पलायन के कारण अब यहाँ केवल चार परिवार ही बचे हैं।
निहाल काज़मी के घर में आज भी आयतुल्लाह ख़ुमैनी की बड़ी तस्वीर लगी हुई है।

उनका दावा है कि ख़ुमैनी के परदादा सैयद अहमद मुसावी ‘हिंदी’ का जन्म इसी गाँव में हुआ था। बताया जाता है कि 1834 के आसपास वह अवध के तत्कालीन नवाब के साथ ज़ियारत के लिए ईरान गए थे। ईरान जाने के बाद उन्होंने वहीं बसने का फैसला कर लिया और वापस भारत नहीं लौटे।
स्थानीय लोग बताते हैं कि उनके परिवार की रिश्तेदारी भी उसी वंश से जुड़ी हुई है। ख़ामेनेई की मौत के बाद इस गाँव में मीडिया का आना-जाना बढ़ गया है। गाँव के लोगों ने इस घटना के बाद तीन दिनों तक शोक सभाएँ भी आयोजित कीं।
इन सभाओं में शिया और सुन्नी दोनों समुदाय के लोगों ने हिस्सा लिया। किंतूर गाँव में कई ऐतिहासिक इमारतें और सूफ़ी संतों की पुरानी मज़ारें भी मौजूद हैं।
लखनऊ के प्रमुख शिया धर्मगुरु आगा रूही के पूर्वज भी इसी गाँव के रहने वाले बताए जाते हैं। उनके अनुसार आयतुल्लाह ख़ुमैनी के परिवार का संबंध भी किंतूर से जुड़ा हुआ था।
इतिहासकारों का कहना है कि अवध के नवाब भी शिया समुदाय से थे। इसी वजह से उस समय लखनऊ और आसपास के इलाकों में शिया आबादी बड़ी संख्या में बसती थी। कहा जाता है कि ईरान के निशापुर क्षेत्र से कई लोग उस दौर में भारत आए और यहीं बस गए।
ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत के शिया समुदाय में भी नाराज़गी देखी जा रही है। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में लोगों ने प्रदर्शन कर अमेरिका और इसराइल के हमलों की निंदा की।
भारत में शिया समुदाय ने इस घटना पर तीन दिन का शोक भी घोषित किया। लखनऊ में शिया धर्मगुरुओं ने ईद की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बाँधकर विरोध जताने की अपील की है।