NEWS PR डेस्क: बड़े-बड़े अपराधों में नाम आने के बावजूद अनंत सिंह का प्रभाव आखिर कैसे बना रहता है? उनकी रिहाई पर इतनी बड़ी भीड़ क्यों उमड़ती है—जानिए उनके दबदबे की पूरी कहानी।
बिहार की राजधानी पटना स्थित बेऊर जेल का गेट सोमवार शाम जैसे ही खुला, चारों तरफ पटाखों की तेज आवाज गूंजने लगी। हजारों समर्थक “छोटे सरकार जिंदाबाद” के नारे लगा रहे थे। माहौल में फूलों की बारिश हो रही थी। इसी दौरान जब अनंत सिंह लैंड क्रूजर में निकले, तो नजारा ऐसा था जैसे कोई राजा अपने इलाके में लौट रहा हो।

चार महीने पहले दुलारचंद यादव हत्याकांड में गिरफ्तार हुए ‘छोटे सरकार’ जमानत पर बाहर आए और पूरा इलाका जश्न में डूब गया। लेकिन सवाल अब भी वही है—50 से ज्यादा आपराधिक मामलों के बावजूद उनका प्रभाव क्यों कायम है?
भाई की हत्या के बाद बना दबदबा
यह कहानी 90 के दशक से शुरू होती है। अनंत कुमार सिंह को उसी समय से मोकामा-पटना इलाके में ‘छोटे सरकार’ कहा जाने लगा। उनका जन्म 1961 में नदवान गांव के भूमिहार परिवार में हुआ। उनके बड़े भाई दिलीप सिंह, जिन्हें ‘बड़े सरकार’ कहा जाता था, इलाके के प्रभावशाली नेता थे। बताया जाता है कि नक्सलियों ने उनके भाई की हत्या कर दी, जिसके बाद अनंत सिंह ने बदला लेने की कसम खाई। उस समय बिहार में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी का शासन था, और भूमिहार समुदाय पर हमले की घटनाएं सामने आती थीं। माना जाता है कि इसी दौर में अनंत सिंह ने खुद को इस समुदाय के रक्षक के रूप में स्थापित किया। लोगों के मुताबिक, जब प्रशासन कमजोर था, तब ‘छोटे सरकार’ ने इलाके में नियंत्रण बनाए रखा।
क्यों नहीं घटता ‘छोटे सरकार’ का प्रभाव?
साल 2005 में अनंत सिंह ने जदयू के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर विधायक बने। उस समय राज्य में नीतीश कुमार की सरकार थी।

इसके बाद मोकामा सीट उनका मजबूत गढ़ बन गई। उन्होंने पांच बार चुनाव जीता, भले ही उन्होंने जदयू और आरजेडी के बीच पार्टी बदली हो, लेकिन सीट पर पकड़ नहीं छोड़ी। बिहार की बाहुबली राजनीति में उन्हें एक क्लासिक उदाहरण माना जाता है। जहां एक तरफ भूमिहार समुदाय उन्हें ‘जंगल राज’ के खिलाफ खड़े नेता के रूप में देखता है, वहीं गरीब वर्ग के लोग उन्हें त्वरित न्याय देने वाला नेता मानते हैं। जेल में रहते हुए चुनाव जीतना, राज्यसभा मतदान के लिए बाहर आना और फिर भव्य स्वागत—ये सभी उनके लगातार प्रभाव को दिखाते हैं।

52 केस के बावजूद बरकरार है पकड़
2020 के चुनावी हलफनामे में अनंत सिंह ने खुद बताया था कि उन पर 38 गंभीर मामले दर्ज थे, जिनमें 7 हत्या, 11 हत्या के प्रयास और 4 अपहरण के केस शामिल थे। वर्तमान में उनके खिलाफ कुल मामलों की संख्या करीब 52 बताई जाती है।

2015 में आर्म्स एक्ट के मामले में उन्हें सजा हुई थी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने राहत दी। 2022 में यूएपीए के तहत 10 साल की सजा भी सुनाई गई थी, जिसमें बाद में राहत मिल गई। अक्टूबर 2025 में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के बाद उन पर आरोप लगा और चुनाव से पहले उनकी गिरफ्तारी हो गई। इसके बावजूद उन्होंने जेल से ही चुनाव लड़ा। इलाके में पोस्टर लगे—“जेल का फाटक टूटेगा, हमारा शेर छूटेगा।” नतीजतन, उन्हें 91,416 वोट मिले और 28,206 वोटों से जीत दर्ज की।

उनकी प्रतिद्वंदी वीणा देवी (सूरजभान सिंह की पत्नी) हार गईं। यह उनकी छठी जीत थी।
समर्थकों में जबरदस्त जुनून
मोकामा और आसपास के इलाकों में लोग बताते हैं कि ‘छोटे सरकार’ से विवाद सुलझवाना आसान होता है। गरीबों की मदद, बेटियों की शादी, सामूहिक विवाह और क्षेत्र में शांति बनाए रखने जैसे कामों की चर्चा आम है। बाढ़ और मोकामा के कई लोग उन्हें अपना रक्षक मानते हैं। एक समर्थक ने रिहाई के दिन कहा, “पुलिस काम नहीं करती, लेकिन छोटे सरकार एक फोन पर समस्या हल कर देते हैं।” जानकारों का कहना है कि यह प्रभाव डर और भरोसे के मिश्रण पर टिका है—विरोधियों पर नियंत्रण, त्वरित फैसले और समुदाय की सुरक्षा की छवि ने उनकी पकड़ मजबूत की है।
जेल के अंदर-बाहर एक जैसा दबदबा
घोड़ों का शौक, शानदार जीवनशैली और मोकामा क्षेत्र में ‘मिनी सरकार’ जैसा संचालन उनकी अलग पहचान बनाता है।

19 मार्च को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद 23 मार्च को उनकी रिहाई हुई। बेऊर जेल से लेकर पटना स्थित आवास तक समर्थकों की भीड़ उमड़ी रही। घर पर भव्य स्वागत हुआ—महंगे पटाखे और तरह-तरह के व्यंजन। इसके बाद वे बड़हिया के महारानी स्थान भी पहुंचे। हालांकि, उनकी जमानत सशर्त है और अदालत ने स्पष्ट किया है कि गवाहों को प्रभावित करने की स्थिति में जमानत रद्द की जा सकती है। लेकिन समर्थकों का कहना है—“छोटे सरकार वापस आ गए, अब सब ठीक है।”