सत्ता करीब थी.. मौका बड़ा था—लेकिन निशांत कुमार ने पद नहीं..रणनीति को चुना

Nishant Kumar chose strategy, not position

Amit Singh

बिहार की सियासत में जिस नाम को लेकर सबकुछ तय माना जा रहा था, उसी ने आखिरी वक्त में ऐसा कदम उठाया कि पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल गई। सब कुछ तय था, नाम तय था, पद तय था । एक ऐसा नाम, जिसे सत्ता के केंद्र में देखा जा रहा था, उसी ने आखिरी वक्त में खुद ही पीछे हटकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। दरअसल, नई सरकार के गठन के साथ यह कयास लगाए जा रहे थे कि निशांत कुमार को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। यहां तक कि उन्हें उपमुख्यमंत्री पद के लिए भी मजबूत दावेदार माना जा रहा था लेकिन अंतिम क्षणों में उन्होंने इस भूमिका से खुद को अलग कर लिया।
सम्राट चौधरी की कैबिनेट में निशांत कुमार की एंट्री लगभग तय …
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, सम्राट चौधरी की कैबिनेट में निशांत कुमार की एंट्री लगभग तय मानी जा रही थी हालांकि, अचानक हुए बदलाव में विजय चौधरी, बिजेंद्र यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। बता दें कि हाल के दिनों में राजनीति में निशांत कुमार की सक्रियता जरूर बढ़ी है। वे पार्टी कार्यक्रमों और सार्वजनिक आयोजनों में लगातार नजर आ रहे हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि वे संगठन और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी नेतृत्व चाहता है कि निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में तेजी से आगे बढ़ें और सरकार में अहम भूमिका निभाएं लेकिन उनका खुद का रुख थोड़ा अलग दिखाई दे रहा है। वे किसी बड़े पद को जल्दबाजी में स्वीकार करने के बजाय, धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं।
निशांत ने 8 मार्च को जदयू की सदस्यता ली थी
दरअसल निशांत कुमार का यह फैसला यह दर्शाता है कि वे जल्दबाजी में सत्ता की राजनीति में कदम रखने के इच्छुक नहीं हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि वे किस तरह अपनी राजनीतिक पहचान बनाते हैं और आने वाले समय में बिहार की राजनीति में अपनी भूमिका तय करते हैं। सूत्रों के हवाले से निशांत का मानना है कि जनता के बीच से चुनकर आना और अपनी मेहनत से पहचान बनाना ज्यादा जरूरी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला पूरी तरह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है नीतीश कुमार अपने पूरे राजनीतिक जीवन में परिवारवाद से दूरी बनाए रखते आए हैं और विपक्ष, खासकर आरजेडी, पर इसी मुद्दे को लेकर हमला करते रहे हैं। ऐसे में अगर निशांत को सीधे डिप्टी सीएम बनाया जाता, तो उनकी छवि पर सवाल उठते और विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना देता। नीतीश कुमार पहले से ही राजनीति में परिवारवाद के सख्त खिलाफ रहे हैं। ऐसे में बेटे की इंट्री से नीतीश की उस साफ छवि को झटका लग सकता है। नीतीश चाहते हैं कि निशांत जनता और जमीन पर तपकर आएं।
एक लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा
फिलहाल साफ है कि निशांत का डिप्टी सीएम पद ठुकराना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। वे जल्दबाजी में सत्ता नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक आधार बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। आने वाले समय में पार्टी संगठन में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है, जिसके बाद उनकी भूमिका और भी अहम हो जाएगी। जानकारी के लिए बता दें कि निशांत ने 8 मार्च को जदयू की सदस्यता ली थी। उसी समय से कयास लगने लगे थे कि वे सरकार में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया, तब पार्टी के कई विधायक और सांसद चाहते थे कि निशांत को डिप्टी सीएम या यहां तक कि मुख्यमंत्री बनाया जाए।

Share This Article