NEWS PR डेस्क: पटना, 01 जून। बिहार में बढ़ती गर्मी और उमस के बीच एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) यानी चमकी बुखार के खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने राज्यभर में सतर्कता बढ़ा दी है। खासकर उत्तर बिहार के जिलों में विशेष निगरानी रखी जा रही है, जहां हर वर्ष गर्मी के मौसम में बच्चों के बीच इस बीमारी के मामले सामने आते हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से बच्चों को तेज धूप से बचाने, पर्याप्त मात्रा में पानी और ओआरएस पिलाने की अपील की है। विभाग का कहना है कि यदि बच्चे में तेज बुखार, बेहोशी, झटके या ऐंठन जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए उसे नजदीकी अस्पताल पहुंचाया जाए।
राज्य स्वास्थ्य समिति ने सभी जिलों को अलर्ट पर रहने और एईएस मरीजों के त्वरित इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों को सक्रिय कर दिया गया है और चिकित्सा संसाधनों की उपलब्धता की लगातार समीक्षा की जा रही है।

गंभीर मरीजों के इलाज के लिए 15 अतिसंवेदनशील जिलों में 10-10 बेड वाले पीआईसीयू वार्ड तैयार किए गए हैं। वहीं, मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में 100 बेड का अत्याधुनिक पीआईसीयू वार्ड संचालित किया जा रहा है, जहां गंभीर बच्चों को विशेष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
इसके अलावा जिला अस्पतालों में पांच-पांच और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दो-दो बेड आरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है। सभी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को दवाओं, जांच सुविधाओं तथा आवश्यक उपकरणों का पर्याप्त भंडार बनाए रखने को कहा गया है।
पटना, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, सारण, सिवान, गोपालगंज, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी तथा शिवहर समेत कई जिलों में विशेष निगरानी अभियान चलाया जा रहा है। स्वास्थ्य केंद्रों में एईएस और जापानी इंसेफेलाइटिस (JE) के लिए नोडल अधिकारियों की तैनाती भी की गई है।

रोग से निपटने के लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही अस्पतालों में दवा, जांच और एंबुलेंस सेवाओं को निशुल्क एवं चौबीसों घंटे सक्रिय रखने के निर्देश जारी किए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में हर साल करीब 150 से 200 बच्चे चमकी बुखार से प्रभावित होते हैं। इनमें मृत्यु दर 30 से 40 प्रतिशत तक दर्ज की जाती है। वर्ष 2019 में इस बीमारी ने सबसे गंभीर रूप लिया था, जब बड़ी संख्या में बच्चों की जान गई थी।
चमकी बुखार पर बिहार में हाई अलर्ट, अस्पतालों में विशेष तैयारी; अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह
NEWS PR डेस्क: पटना, 01 जून। बिहार में बढ़ती गर्मी और उमस के बीच एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) यानी चमकी बुखार के खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने राज्यभर में सतर्कता बढ़ा दी है। खासकर उत्तर बिहार के जिलों में विशेष निगरानी रखी जा रही है, जहां हर वर्ष गर्मी के मौसम में बच्चों के बीच इस बीमारी के मामले सामने आते हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से बच्चों को तेज धूप से बचाने, पर्याप्त मात्रा में पानी और ओआरएस पिलाने की अपील की है। विभाग का कहना है कि यदि बच्चे में तेज बुखार, बेहोशी, झटके या ऐंठन जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए उसे नजदीकी अस्पताल पहुंचाया जाए।
राज्य स्वास्थ्य समिति ने सभी जिलों को अलर्ट पर रहने और एईएस मरीजों के त्वरित इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों को सक्रिय कर दिया गया है और चिकित्सा संसाधनों की उपलब्धता की लगातार समीक्षा की जा रही है।
गंभीर मरीजों के इलाज के लिए 15 अतिसंवेदनशील जिलों में 10-10 बेड वाले पीआईसीयू वार्ड तैयार किए गए हैं। वहीं, मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में 100 बेड का अत्याधुनिक पीआईसीयू वार्ड संचालित किया जा रहा है, जहां गंभीर बच्चों को विशेष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
इसके अलावा जिला अस्पतालों में पांच-पांच और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दो-दो बेड आरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है। सभी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को दवाओं, जांच सुविधाओं तथा आवश्यक उपकरणों का पर्याप्त भंडार बनाए रखने को कहा गया है।
पटना, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, सारण, सिवान, गोपालगंज, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी तथा शिवहर समेत कई जिलों में विशेष निगरानी अभियान चलाया जा रहा है। स्वास्थ्य केंद्रों में एईएस और जापानी इंसेफेलाइटिस (JE) के लिए नोडल अधिकारियों की तैनाती भी की गई है।
रोग से निपटने के लिए डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही अस्पतालों में दवा, जांच और एंबुलेंस सेवाओं को निशुल्क एवं चौबीसों घंटे सक्रिय रखने के निर्देश जारी किए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में हर साल करीब 150 से 200 बच्चे चमकी बुखार से प्रभावित होते हैं। इनमें मृत्यु दर 30 से 40 प्रतिशत तक दर्ज की जाती है। वर्ष 2019 में इस बीमारी ने सबसे गंभीर रूप लिया था, जब बड़ी संख्या में बच्चों की जान गई थी।
पटना सिविल सर्जन ने बताया कि पीएमसीएच, एनएमसीएच और अन्य सरकारी अस्पतालों में विशेष इंतजाम किए गए हैं। मरीजों के लिए पर्याप्त बेड, दवाएं, ग्लूकोज, ओआरएस और एंबुलेंस सेवाएं उपलब्ध रखी गई हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।