भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा और तकनीक से जोड़ने पर जोर, राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न

Rashmi Tiwari

NEWS PR डेस्क: आज( 6 सितम्बर, 2026) राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एस.एस.आर.) द्वारा सम्पोषित “Role and Relevance of Bhartiya Gyan Parampara in Vishal Bharat” (विशाल भारत में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका एवं प्रासंगिकता) विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन ललित नारायण मिश्र कॉलेज ऑफ बिजनेस मैनेजमेन्ट, मुजफ्फरपुर में किया गया।

आज के तकनीकी सत्र की शुरूआत डा. पी. ओमकार (असिसटेन्ट प्रोफेसर शिक्षा विभाग, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी) द्वारा किया गया। उनका कहना था कि “हमारे सामने चुनौती ये है कि विशाल भारत जो भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं भाषा में विशाल है उसके पास डेमोग्राफिक डिविडेन्ड है और ये कुछ दशक तक जारी रहेगा। पूरा विश्व हमारे तरफ देख रहा है क्योंकि हमारे पास युवा संख्या ज्यादा है।

रूस, चीन, अमेरिका इत्यादि के पास जनसंख्या डिविडेन्ड नहीं है। हम इस संख्या को कैसे दिशा दे रहे हैं, ये समस्या है। हमें यह चिन्तन करने की जरूरत है कि हम लोगों में से कितने सच में पढ़ाई करने के लिए पढ़ रहे हैं, या सच में नौकरी लेने के लिए पढ़ना चाहते हैं। हमारे देश में ऐसा कोई भी कोर्स नहीं, जिसे सही ढंग से पढ़ ले तो उसमें अपार मौका नहीं है लेकिन हम वह नहीं पढ़ रहे हैं जो मौका उपलब्ध करायेगा जैसे “भाषा की नींव”।

एन.ई.पी. 2020, इन्डिका अध्ययन की बात कर रहा है। विद्यार्थी के मन में प्रश्न है कि क्या हम भारतीयता ला पायेंगे। जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन करेंगे तो हम सफल हो पायेंगे। अध्ययन सामग्री एवं पाठ्यक्रम किस तरह बनाया जाए कि अध्यापन संबंधी चुनौतियाँ कम से कम हो सके। आज छात्र से ज्यादा शिक्षक के पास चुनौतियाँ है। बदलते परिपेक्ष्य में जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है क्या उसे भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ पाएंगे। पाठ्य सामग्री ऐसी होनी चाहिए कि अपने स्थानीय भाषा में हम विषय को समझ पायें।

वैश्विक स्तर पर एक विशेष भाषा को वैश्विक रैंकिंग के बोझ को समझना होगा और उसे हटाना होगा। विद्यार्थी समझ नहीं पा रहे कि आखिर इस बोझ को कैसे उतारा जाए। आर्थिक रफ्तार यदि स्थानीय जिलों में देखी जा रही है तो अन्य जिलों में कैसे बढ़ायी जाए। इसके लिए पाठ्य सामग्री एवं पाठ्यक्रम पर विशेष र्काय करने की जरूरत है क्योंकि ये दोनों अध्ययन और अध्यापन की आत्मा है।”डा. नीलिमा झा, (प्राचार्या, रामसकल सिंह महाविद्यालय, सीतामढ़ी) ने कहा कि भारतीय परंपरा के लोकप्रिय कृति कालिदास के अभिज्ञान शकुन्तलम के माध्यम से छात्रों को सामाजिक शिष्टाचार पर विकसित होना चाहिए।

संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डा. नीरज कुमार ने अपने प्रपत्र के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा की सार्वभौमिकता को कॉरपोरेट कम्पीटेन्ट डेवलपमेंट में तैत्तिरीयोपनिषद् के पंचकोष के सिद्धांत को सबल बताया और सी.एल.एस. एवं सी.आर.बी. मॉडल को मिश्रित कर इसे आधुनिक प्रबंधन के मैसलो सिद्धांत के मूल स्रोत के तौर पर स्थापित किया।द्वितीय सत्र का आरंभ प्रो. रंजन कुमार, बेहेरा (एसोसिएट प्रोफेसर, एलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग, आई.आई.टी., पटना) के द्वारा किया गया। उन्होंने अपने प्रपत्र के माध्यम से सार्वभौमिक कल्याण, तनाव प्रतिक्रिया प्रणाली एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के द्वारा अपनाये गये रोजमर्रा के अभ्यास को विस्तृत रूप से वास्तविक उदाहरण देते हुए प्रस्तुत किया।अन्य शोधार्थियों में श्रीमती कात्याणी शंकर ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी अपने व्यक्तिगत लाभ को त्यागते हुए नियोक्ता एवं कर्मचारी के बीच में संस्था के अंतर्गत नैतिक वातावरण तैयार किया जा सकता है।

महाविद्यालय के बीबीए की छात्रा अक्षरा, अंशु, श्यामा एवं रेजा ने भारतीय ज्ञान परंपरा की बृहत और प्रासंगिक तथ्यों का चित्रण करते हुए इस बात को पुष्ट किया कि आज की शिक्षण प्रणाली में इसका जुड़ना रूचिकर और प्रासंगिक है।शाम्भवी (शोधकर्ता आई.बी.एम., पटना) ने अपने शोध पत्र के द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा के आन्वीक्षिकी, त्रिगुण, उपाय के द्वारा संगठनात्मक संघर्ष को दूर करने की राह से अवगत कराया। किसी विषय को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देखने या समझने पर विचार करना और उसके समस्या संबंधी उपायों तक पहुँचने की युक्ति निकालने की विधि का भी प्रस्तुतीकरण किया।

मुख्य वक्ता डा. राम नाथ झा (एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत अध्ययन विशेष केन्द्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय) ने अपने व्याख्यान में कहा कि भाषा ज्ञान के महत्व पर पूर्ण ध्यान रखना होगा जो जीवन के आधार को मजबूत करती है और उसको धारण करने का स्रोत भी बताती है। प्रस्तुति में कहा कि संस्कृत भाषा हमारे भारत के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। मैकाले पद्धति से पहले यही सर्वमान्य भाषा थी।

उन्होंने बताया कि वेद से प्राप्त ज्ञान में स्वतंत्रता एवं शाश्वता है। वैश्विक कारकों का एकीकरण कैसे किया जाए उस पर विस्तार से चर्चा की। मानवीय अधिकार एवं मानवीय विलक्षण के तात्विक स्वरूप को विस्तार से बताया। डा. वर्णिका शर्मा, (अध्यक्ष, राज्य मंत्री, राज्य आयुक्त चाइल्ड राइट प्रोटेक्शन, छत्तीसगढ) ने कहा कि शिक्षा, धर्म एवं इतिहास का समायोजन करना होगा, तभी राष्ट्र का निर्माण होगा। कलेशी तत्व हमारे पास न आने पाये इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा को हमारे आधुनिक प्रणाली में समाहित करना होगा।

ज्ञान वो है जो स्वयं प्यासे रहकर भी ग्लास में एक बूँद भी है तो प्यासे को पिला देना।कार्यक्रम के समापन भाषण में आये मुख्य अतिथि प्रो. अरूण कुमार भगत, (मीडिया स्टडीज विभाग, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी) ने कहा कि आचार्य सुश्रुत भारतीय ज्ञान परंपरा के शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। उन्होंने आगे कहा कि चरक और सुश्रुत के नाम अत्यंत प्रभावी ढंग से आज के चिकित्सा क्षेत्र में लिया जाता है। हमारे ऋषियों के पास जो अनुभव था उसी आधार पर उस वक्त जो वर्णन किया वह आज के भारत के लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्तकरता है।

सह-अस्तित्व की भावना कैसे विकसित किया जा सका है यह पारंपरिक ज्ञान में देखा जा सकता है। भारत के ज्ञान में नैतिकता का समायोजन है। गणितज्ञ, खगोल शास्त्री आर्यभट्ट ने शून्य का विस्तार किया। स्कन्द पुराण में आकाश को शून्य कहा गया है। भारत ने खोज नहीं की होती तो आज जो शून्य की चर्चा होती है वहीं नहीं हो पाती। वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण एवं महाभारत आज भी हमारे ज्ञान की आधारशिला है।संस्थान के निदेशक डा. मनीष कुमार ने कहा कि इस सेमिनार के द्वारा ये बातें निकलकर आई है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित समग्रता, आत्मनिर्भरता, नैतिक मूल्यों, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता आधुनिक भारत को विशाल भारत की तरफ ले जा रहा है।

महाविद्यालय के कुलसचिव डा. कुमार शरतेन्दु शेखर ने कहा कि विशाल भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के साथ अपनी समृद्धि भारतीय ज्ञान परंपरा को जोड़ना आवश्यक है। प्रबंधन संकाय के विभागाध्यक्ष डा. श्याम आनन्द झा ने कहा कि सूचना ज्यादा इक‌ट्ठा करने की अपेक्षा ज्ञान अर्जित करने पर पूर जोर कोशिश करनी चाहिये।

कम्प्यूटर अपलीकेशन संकाय के विभागाध्यक्ष डा. आई.बी. लाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता को आधुनिक शिक्षा एवं विकास के संदर्भ में समझना तथा युवाओं को अपनी समृद्ध ज्ञान विरासत से जोड़ना है।कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा की नई पीढ़ी तक पहुँचने तथा विशाल भारत के संकल्प को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस प्रणाली की प्रासंगिकता को आधुनिक शिक्षा एवं विकास के संदर्भ में समझना तथा युवाओं को अपनी समृद्ध ज्ञान विरासत से जोड़ना है। प्रबंधन संकाय के विभागाध्यक्ष डा. श्याम आनन्द झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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