CM से राज्यसभा तक! क्या नीतीश कुमार का नया राजनीतिक प्रयोग जदयू पर भारी पड़ेगा?

Asha Rai
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NEWS PR डेस्क:बिहार लंबे समय से भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला रहा है, जहां से उठे कई राजनीतिक प्रयोगों ने देश की दिशा और दशा पर गहरा प्रभाव डाला है। चाहे वह *जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति हो या मंडल आयोग के बाद उभरी सामाजिक न्याय की राजनीति, बिहार ने कई ऐतिहासिक मोड़ देखे हैं। लेकिन मौजूदा समय में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कथित तौर पर ‘जबरिया रिटायर कर राज्यसभा भेजने की जो चर्चा चल रही है, वह लोगों के लिए सहज स्वीकार्य नहीं लग रही। नीतीश कुमार का यह तर्क भी कई लोगों को संतोषजनक नहीं लगता कि वे लगभग सभी सदनों का हिस्सा रह चुके हैं और अब सिर्फ राज्यसभा का अनुभव लेना चाहते हैं।

पहली नजर में यह मामला इसलिए भी अलग दिखाई देता है, क्योंकि भारतीय राजनीति के प्रोटोकॉल में किसी बड़े राज्य के मुख्यमंत्री का पद अक्सर किसी भी केंद्रीय मंत्री से अधिक प्रभावशाली माना जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी बिहार के मुख्यमंत्री का पद प्रतिष्ठा और प्रभाव के लिहाज से शीर्ष पदों में गिना जाता है। ऐसे में केवल एक सदन का अनुभव लेने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की संभावना कई लोगों को चौंकाने वाली लगती है और इससे सत्ता के गलियारों में कई तरह की अटकलें भी जन्म ले रही हैं।

जदयू के भविष्य पर सवाल

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नीतीश कुमार के राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक पद से हटने की संभावना सीधे तौर पर उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के भविष्य पर भी सवाल खड़े करती है। इतिहास देखें तो जनता पार्टी से ही जनता दल बना और बाद में उससे कई क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ, जिनमें जदयू भी शामिल है। इनमें से कुछ दल आज भी अपने-अपने राज्यों में मजबूत स्थिति में हैं, जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर)। वहीं कई अन्य दल समय के साथ राजनीतिक परिदृश्य से लगभग गायब हो गए। उदाहरण के तौर पर चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी या सुब्रमण्यम स्वामी की जनता पार्टी, जो बाद में भाजपा में उनके शामिल होने के बाद समाप्त हो गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या नीतीश कुमार के इस कदम से, जिसे कुछ विरोधी भाजपा के सामने उनका ‘सरेंडर’बता रहे हैं, जदयू के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा सकता है।

राष्ट्रीय दलों की छाया में क्षेत्रीय दल

यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है कि बड़े राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन करने वाले कई क्षेत्रीय दल धीरे-धीरे अपनी पहचान खो बैठते हैं। पहले यह भूमिका कांग्रेस निभाती थी, जबकि अब कई राज्यों में भाजपा के साथ गठबंधन के बाद क्षेत्रीय दलों की स्थिति कमजोर होने की चर्चा होती रही है। असम से लेकर महाराष्ट्र तक कई उदाहरण दिए जाते हैं, जहां राष्ट्रीय दल मजबूत हुए और क्षेत्रीय सहयोगी अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गए। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का मुख्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री के पद तक आना या पंजाब में अकाली दल का कमजोर होना इसी चर्चा को बल देता है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी क्षेत्रीय दल सत्ता में रहते हुए केंद्र के प्रभाव से पूरी तरह अलग होकर निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करते हैं।

नीतीश के बाद नेतृत्व कौन?

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि बिहार में जदयू का भविष्य क्या होगा और नीतीश कुमार के बाद पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा। अधिकांश क्षेत्रीय दलों में दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार करने की परंपरा उतनी मजबूत नहीं रही है। कई जगहों पर नेतृत्व परिवार के भीतर ही आगे बढ़ता है। जदयू में भी फिलहाल ऐसा कोई बड़ा नेता स्पष्ट रूप से नजर नहीं आता जो नीतीश कुमार की जगह ले सके और भाजपा जैसे बड़े सहयोगी के साथ संतुलन बनाए रख सके। हालांकि हाल ही में उनके बेटे निशांत कुमार के राजनीति में आने और JDU ज्वाइन करने से सियासी हलचल ज़रूर बढ़ी है, लेकिन इसे अभी शुरुआती कदम ही माना जा रहा है। साथ ही, ऐसा कहा जा रहा है की नीतीश कुमार ने राजनीति में अपने बेटे निशांत कुमार को लाने में भी बहुत देर कर दी है. अभी यह साफ नहीं है कि वे सक्रिय राजनीति में किस भूमिका में नजर आएंगे।

क्या ‘मार्गदर्शक मंडल की ओर कदम?

दिलचस्प संयोग यह भी है कि भाजपा में 75 वर्ष की उम्र के बाद सक्रिय राजनीति से अलग होने की एक अनौपचारिक परंपरा की चर्चा अक्सर होती रही है, हालांकि कुछ अपवाद भी रहे हैं। इसी महीने की पहली तारीख को नीतीश कुमार ने 75 वर्ष की उम्र पूरी की है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वे खुद को धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से अलग कर किसी मार्गदर्शक की भूमिका में लाने की तैयारी कर रहे हैं।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह कदम बिहार की राजनीति में *क्षेत्रीय अस्मिता के कमजोर पड़ने की शुरुआत होगा या फिर किसी नए राजनीतिक समीकरण का संकेत। लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब आने वाले समय में ही सामने आ पाएंगे।

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