बिहार विधानसभा में गूंजा ‘डिजिटल लत’ का मुद्दा, बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नई पॉलिसी लाएगी सरकार

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: पटना। डिजिटल युग में मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल अब बच्चों और किशोरों के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। रील्स, ऑनलाइन गेम और लगातार स्क्रॉलिंग की आदत को लेकर सोमवार को बिहार विधानसभा में गंभीर चर्चा हुई। बहस के बाद राज्य सरकार ने संकेत दिया कि बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए नई और व्यापक नीति लाई जाएगी।

सिकटा (पश्चिम चंपारण) से जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने सदन में यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि गांवों तक मोबाइल की पहुंच बढ़ने के साथ बच्चों में सोशल मीडिया और यूट्यूब देखने की आदत तेजी से बढ़ी है। ऑनलाइन गेम्स की लत भी चिंता का विषय बन चुकी है। उन्होंने सरकार से आयु-आधारित स्क्रीन टाइम सीमा तय करने की मांग की और कहा कि यह केवल तकनीक का सवाल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।

वर्मा ने जोर देकर कहा कि आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर समन्वित रणनीति बनानी होगी। उन्होंने बच्चों में बढ़ती स्क्रीन एडिक्शन को “अदृश्य महामारी” करार देते हुए कहा कि रील्स जैसे कंटेंट से डोपामाइन का प्रभाव बढ़ता है, जिससे बच्चों की एकाग्रता कमजोर होती है और वास्तविक जीवन नीरस लगने लगता है। उनका सवाल था कि जब सरकार एआई शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, तो डिजिटल लत से बचाव के लिए सुरक्षा तंत्र भी समान रूप से जरूरी है।

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आईटी मंत्री श्रेयसी सिंह ने इस विषय को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार की गाइडलाइंस का अध्ययन किया जा रहा है। बिहार सरकार बहुविभागीय दृष्टिकोण अपनाएगी। उन्होंने बताया कि बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) से विशेषज्ञ सलाह मांगी गई है। रिपोर्ट मिलने के बाद सभी संबंधित विभाग मिलकर मानक तय करेंगे।

डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस दिशा में व्यापक नीति पर काम कर रही है, ताकि बच्चों को डिजिटल दुनिया के सकारात्मक उपयोग के साथ-साथ उसके दुष्प्रभावों से भी बचाया जा सके।

विधायक वर्मा ने सुझाव दिया कि स्कूल पाठ्यक्रम में ‘डिजिटल हाइजीन’ को शामिल किया जाए। जिला स्तर पर एडिक्शन क्लीनिक स्थापित किए जाएं और जीविका दीदियों के माध्यम से गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाया जाए।

सदन में हुई चर्चा ने साफ कर दिया है कि डिजिटल सुविधा के साथ डिजिटल अनुशासन भी समय की मांग बन चुका है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार कब तक इस दिशा में ठोस नीति सामने लाती है।

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