पटना में अनोखी शादी: ना पंडित, ना फेरे, ना 7 वचन…संविधान को साक्षी मानकर IITian अधिकारी ने रचाया विवाह

Asha Rai
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NEWS PR डेस्क: बिहार की राजधानी पटना में हुई एक अनोखी शादी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। यादव समाज से आने वाले एक शिक्षित और प्रशासनिक सेवा से जुड़े जोड़े ने पारंपरिक रीति-रिवाजों की बजाय भारतीय संविधान को साक्षी मानकर विवाह किया।

दूल्हा अनंत यादव आईआईटी से पढ़े-लिखे अधिकारी हैं और वर्तमान में अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी (एसडीएम स्तर) के पद पर कार्यरत हैं। वहीं दुल्हन भी उनके ही बैच की प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी हैं। दोनों ने बिना पंडित, बिना मंत्रोच्चार, बिना फेरे और बिना दहेज के सादगीपूर्ण तरीके से शादी की।

इस विवाह में न अग्नि को साक्षी बनाया गया, न सात वचन लिए गए। दोनों ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना के समक्ष समानता, सम्मान और जीवन भर साथ निभाने की शपथ ली। शादी में फिजूलखर्ची से परहेज करते हुए सामाजिक संदेश देने पर जोर दिया गया। यही वजह है कि इस अनोखी पहल को कुछ लोग सामाजिक क्रांति बता रहे हैं, तो कुछ पारंपरिक मान्यताओं के खिलाफ कदम मान रहे हैं।

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हालांकि इस तरह की शादी पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में संविधान को साक्षी मानकर विवाह किए जा चुके हैं।

हिमाचल में दो भाइयों ने रचा था ऐसा विवाह

सिरमौर जिला के शिलाई क्षेत्र के कलोग गांव में 26 अक्टूबर 2025 को दो सगे भाइयों—सुनील कुमार और विनोद कुमार—ने संविधान को साक्षी मानकर विवाह किया था। दोनों ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित होकर पारंपरिक ब्रह्म विवाह की बजाय सादगीपूर्ण और संवैधानिक विवाह को चुना।

इस समारोह में न पंडित था, न फेरे हुए और न ही सात वचन लिए गए। विवाह कार्ड पर एक ओर महात्मा बुद्ध और दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर की तस्वीर छपी थी। दोनों भाइयों ने अपनी दुल्हनों के साथ संविधान को साक्षी मानकर जीवन भर साथ रहने की शपथ ली और बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त किया।

राजस्थान में दो न्यायिक अधिकारियों ने भी दी थी मिसाल

इसी तरह राजस्थान में भी दो न्यायिक अधिकारियों—हेमंत मेहरा और करीना काला—ने नवंबर 2025 में बिना दहेज और बिना आडंबर के संविधान को साक्षी मानकर विवाह किया था। उनकी सादगी और सामाजिक संदेश की उस समय काफी चर्चा हुई थी।

पटना की यह शादी भी उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है, जहां पढ़े-लिखे युवा दहेज प्रथा और फिजूलखर्ची के खिलाफ संदेश देते हुए समानता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित विवाह को प्राथमिकता दे रहे हैं।

फिलहाल, इस अनोखी शादी को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है—कोई इसे प्रगतिशील कदम बता रहा है तो कोई परंपराओं से हटकर लिया गया निर्णय। लेकिन इतना तय है कि इस पहल ने समाज में विवाह की परंपराओं पर नई चर्चा जरूर छेड़ दी है।

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