NEWS PR डेस्क: बिहार की सियासत में अगर किसी नेता की होली सबसे अलग और चर्चित रही है, तो वह रही लालू प्रसाद यादव की ‘कुर्ता फाड़’ होली। रंग, अबीर, ढोल-झाल, फगुआ और ठेठ देहाती अंदाज—यही पहचान बन गई थी उनकी होली की। सिर पर टोपी, बदन पर फटा कुर्ता और होंठों पर “जोगीरा सारा रारा…—यह नज़ारा कभी पटना के मुख्यमंत्री आवास के आवास की खास पहचान हुआ करता था।

1990 में जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो कहा जाता है कि मुख्यमंत्री आवास आम लोगों के लिए खुल गया। होली के मौके पर वहां किसी खास निमंत्रण की जरूरत नहीं होती थी। कार्यकर्ता, समर्थक और आम लोग—सब खुलकर शामिल होते थे। उनके कार्यकाल में ‘कुर्ता फाड़’ होली की परंपरा शुरू हुई, जो बाद में उनकी पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के समय में भी जारी रही।

क्यों खास थी ‘कुर्ता फाड़’ होली?
लालू यादव की होली की तैयारी करीब 15 दिन पहले से शुरू हो जाती थी। आयोजन की जिम्मेदारी पार्टी के करीबी नेताओं पर रहती थी। होली के दिन माहौल ऐसा बनता कि रंग और अबीर के बीच कब किसका कुर्ता फट गया, किसी को पता ही नहीं चलता।
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि खुद मुख्यमंत्री रहते हुए भी लालू यादव अपना कुर्ता फड़वाने में पीछे नहीं रहते थे। वे मजाकिया अंदाज में अपने समर्थकों का कुर्ता फाड़ देते थे और खुद भी रंग में पूरी तरह सराबोर हो जाते थे।

यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था—हर कोई एक ही रंग में रंगा नजर आता था।
ढोल-झाल और फगुआ की महफिल
‘कुर्ता फाड़’ के बाद शुरू होती थी फगुआ की महफिल। लालू यादव खुद ढोल और झाल लेकर बैठ जाते थे। देहाती अंदाज में होली गीत गाते और माहौल को पूरी तरह ग्रामीण रंग में रंग देते थे।

उनकी यही सादगी और गंवई अंदाज कार्यकर्ताओं को उनसे भावनात्मक रूप से जोड़ देता था। कई लोग मानते हैं कि उनकी होली ने पारंपरिक देहाती संस्कृति को जिंदा रखने का काम किया।
अब बस यादें ही रह गईं
पिछले कुछ वर्षों से लालू प्रसाद यादव की तबीयत खराब रहने के कारण वह रंगीन और हुड़दंग भरी होली देखने को नहीं मिलती। कभी जिस लालू-राबड़ी के आवास में रंगों की बौछार और फगुआ की गूंज होती थी, वहां अब वैसा नजारा कम ही दिखता है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लालू यादव की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मेल-मिलाप का प्रतीक बन गई थी।
आज भी उनके समर्थक कहते हैं—“असली होली तो लालू आवास पर ही मनती थी।”
मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने भी मुख्यमंत्री आवास में अपने अलग अंदाज में होली मनाने की परंपरा निभाई। हालांकि उनका स्वभाव लालू प्रसाद से बिल्कुल अलग रहा, और उसी का असर उनकी होली पर भी साफ दिखाई देता था।
नीतीश कुमार की होली सादगी भरी होती थी। जहां लालू यादव की होली में हुड़दंग और ‘कुर्ता फाड़’ अंदाज दिखता था, वहीं नीतीश की होली में गुलाल और फूलों का प्रयोग ज्यादा होता था। वे सीमित दायरे में कार्यकर्ताओं से मिलते, गुलाल लगाकर शुभकामनाएं देते और सादगीपूर्ण माहौल में त्योहार मनाते थे।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री आवास पर होली का आयोजन धीरे-धीरे सिमटता गया है। अब वह पुराना उत्साह और खुलापन कम ही देखने को मिलता है—और कई लोग मानते हैं कि लालू यादव वाली बात अब नहीं रही।