NEWS PR डेस्क : बिहार की राजनीति में एक सवाल बार-बार उठता है। जब तेजस्वी यादव सबसे बड़े चेहरे के रूप में सामने हैं, जनसभाओं में भीड़ खींच रहे हैं और सत्ता के सबसे करीब भी रहे हैं, तो फिर उन्हें अब तक “पूरी कुर्सी” यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी क्यों नहीं मिली ? इसका जवाब आज की राजनीति से ज्यादा, साल 2001 की उस कहानी में छिपा है, जिसने लालू प्रसाद यादव की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।
साल 2001 में लालू यादव ने एक बड़ा और भावनात्मक फैसला लिया। चारा घोटाले में फंसने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बना दिया। सोच यह थी कि सत्ता परिवार में रहेगी और पर्दे के पीछे से नियंत्रण बना रहेगा। लेकिन यहीं से राजनीतिक गलतियों की एक श्रृंखला शुरू हुई। प्रशासनिक कमजोरी, बढ़ता असंतोष और “जंगलराज” की छवि ने आरजेडी को धीरे-धीरे सत्ता से दूर कर दिया। 2005 आते-आते पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और फिर लंबे समय तक वापसी नहीं कर सकी।
आज तेजस्वी यादव के मामले में लालू यादव वही गलती दोहराना नहीं चाहते। तेजस्वी लोकप्रिय हैं, लेकिन लालू उन्हें पूरा नियंत्रण सौंपने के पक्ष में नहीं दिखते। 2022-23 में जब महागठबंधन की सरकार बनी, तब भी तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री की भूमिका दी गई, जबकि राजनीतिक ताकत उनके पास ज्यादा दिख रही थी। लालू जानते हैं कि बिहार की सत्ता सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि जातीय संतुलन, सहयोगी दलों और दिल्ली की राजनीति से जुड़ा एक नाज़ुक खेल है। 2001 में एक भावनात्मक फैसले ने जो नुकसान किया, उसका सबक वे आज भी नहीं भूले हैं।
तेजस्वी की समस्या योग्यता की नहीं, बल्कि टाइमिंग की है। लालू चाहते हैं कि तेजस्वी अभी और परिपक्व हों, राजनीतिक झटकों को खुद झेलें और गठबंधन की जटिलताओं को पूरी तरह समझें। दूसरी ओर, तेजस्वी समर्थकों को लगता है कि पार्टी और वोटर दोनों उनके साथ हैं, फिर देरी क्यों?
क्या तेजस्वी को सीएम न बनाना लालू की राजनीतिक गलती है? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है ताकि 2001 जैसी चूक दोबारा न हो? बिहार की राजनीति में अक्सर जल्दबाज़ी भारी पड़ती है। यह बात लालू यादव से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। फिलहाल इतना तय है कि तेजस्वी को कुर्सी मिलेगी या नहीं, यह सिर्फ उनकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि लालू यादव की याददाश्त तय कर रही है। 2001 का साया आज भी आरजेडी की राजनीति पर साफ दिखाई देता है।