दरभंगा राज की आख़िरी महारानी: जिन ऐतिहासिक तोहफों और संविधान सभा से जुड़े योगदान को देश कभी नहीं भूलेगा

Puja Srivastav
- Advertisements -
Your Brand Here
Limited time offer
Advertise Now →

NEWS PR डेस्क : दरभंगा राज की महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही राजशाही दौर की अंतिम स्मृति भी इतिहास में समा गई है। उनका जाना न सिर्फ एक शाही परंपरा के अंत है, बल्कि एक पूरे युग के समापन की कहानी भी कहता है। महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी कामसुंदरी देवी ने मिथिला ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सामाजिक और विकासात्मक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गौरतलब है कि महाराज कामेश्वर सिंह संविधान सभा (1947–1950) के सदस्य रहे थे, जबकि महारानी कामसुंदरी देवी संविधान सभा के सदस्यों की पत्नियों में अंतिम जीवित सदस्य थीं। उनके निधन के साथ स्वतंत्रता के बाद के उस ऐतिहासिक दौर की एक अहम कड़ी भी समाप्त हो गई है। महारानी कामसुंदरी देवी के निधन ने भले ही एक पूरे दौर पर विराम लगा दिया हो, लेकिन महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी द्वारा समाज और राष्ट्र के लिए किए गए कार्यों को न दरभंगा भूल सकता है और न ही मिथिला, बल्कि उनकी कीर्ति पूरे देश में सदैव स्मरण की जाती रहेगी। शिक्षा, संस्कृति और जनकल्याण के क्षेत्र में उनके योगदान आज भी प्रेरणा देते हैं।

जानकारी के अनुसार वर्ष 1950 में संविधान सभा में कुल 284 सदस्य थे, जिनमें महाराज कामेश्वर सिंह भी शामिल थे। वे 1947 से 1950 तक संविधान निर्माण की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा रहे। संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर के समय उन्होंने दरभंगा का उल्लेख किया था, जो मिथिला क्षेत्र के गौरव का प्रतीक माना जाता है। इससे पहले महाराज कामेश्वर सिंह 1907 से 1962 तक बिहार क्षेत्र से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में चुने जाते रहे थे।महारानी कामसुंदरी देवी का एक विशेष ऐतिहासिक महत्व यह भी था कि वे संविधान सभा के 284 पुरुष सदस्यों की पत्नियों में अंतिम जीवित सदस्य थीं। उनके निधन के साथ भारतीय राजशाही से जुड़ी एक आखिरी ऐतिहासिक स्मृति भी समाप्त हो गई, जिसने देश को भावुक कर दिया है।

- Advertisements -
Your Brand Here
Limited time offer
Advertise Now →

महारानी कामसुंदरी देवी के दान से जुड़ा दरभंगा हाउस आज देश की राजधानी दिल्ली में खुफिया ब्यूरो (आईबी) के मुख्यालय के रूप में उपयोग में है। वहीं दरभंगा स्थित नरगौना पैलेस को उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को दान कर दिया था, जहां वर्तमान में विश्वविद्यालय का पीजी विभाग संचालित होता है। यह भवन कभी महाराज का निजी आवास हुआ करता था।बताया जाता है कि अपने समय में यह पैलेस बेहद आधुनिक सुविधाओं से लैस था। इसे भूकंपरोधी तकनीक से तैयार किया गया था और इसमें एयर कंडीशनिंग व लिफ्ट जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं, जो उस दौर में इसकी हाईटेक पहचान को दर्शाती हैं।

वर्ष 1962 में जब देश गंभीर संकट से गुजर रहा था और भारत-चीन युद्ध छिड़ा था, उस समय महाराज कामेश्वर सिंह ने देशभक्ति की मिसाल पेश की। दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में आयोजित एक सभा के दौरान उन्होंने युद्ध में राष्ट्र की मदद के लिए अपने तीन विमान और करीब 600 किलो सोना दान कर दिया। यही नहीं, दरभंगा में उनके द्वारा लगभग 90 एकड़ में विकसित किए गए एयरपोर्ट को भी उन्होंने सरकार को सौंप दिया था।

इसके अलावा शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी उनका योगदान बेहद अहम रहा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को उन्होंने 50 लाख रुपये का दान दिया। देश के महान वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन को उच्च शिक्षा और शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक बहुमूल्य हीरा भेंट किया। प्राच्य विद्या के संरक्षण और प्रसार के लिए उन्होंने अपना एक अन्य आवास संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए समर्पित किया, जो आगे चलकर ‘कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय’ के नाम से जाना गया।

बिहार की राजधानी पटना में स्थित दरभंगा हाउस को भी महाराज कामेश्वर सिंह ने शिक्षा के विस्तार के लिए दान कर दिया था, जो बाद में पटना विश्वविद्यालय के उपयोग में आया। इसी तरह इलाहाबाद में भी उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना और विकास के लिए बड़ा आर्थिक सहयोग दिया। दरभंगा में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए आवश्यक भवन और भूमि भी महाराज परिवार की ओर से ही उपलब्ध कराई गई थी।इसके साथ ही दरभंगा राज परिवार कला, संगीत और संस्कृति का बड़ा संरक्षक रहा है। शास्त्रीय संगीत के दिग्गज पद्म विभूषण उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और लोकगायक पद्मश्री रामचतुर मल्लिक जैसे महान कलाकार दरभंगा राज के दरबार से जुड़े रहे, जिन्होंने इस सांस्कृतिक विरासत को और समृद्ध किया।

- Advertisements -
Your Brand Here
Limited time offer
Advertise Now →
Share This Article