NEWS PR डेस्क: भारत में समय-समय पर केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों को राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया है। विशेष रूप से भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी—जैसे जनरल और लेफ्टिनेंट जनरल—जिन्होंने लंबे समय तक देश की सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में अहम भूमिका निभाई हो, उन्हें इस संवैधानिक पद की जिम्मेदारी सौंपी जाती रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हाल ही में बिहार के नए राज्यपाल के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन की नियुक्ति की गई है।
दरअसल, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के पास अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और कठिन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने का व्यापक अनुभव होता है। यही वजह है कि कई बार सरकार उन्हें प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए भी उपयुक्त मानती है। खासकर ऐसे राज्यों में, जहां सुरक्षा या रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशीलता अधिक होती है, वहां पूर्व सैन्य अधिकारियों को राज्यपाल बनाना एक सोच-समझकर लिया गया फैसला माना जाता है।
भारत में इससे पहले भी कई पूर्व सैन्य अधिकारियों को राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी है। इनमें लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. सिन्हा का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। वह भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी रहे और बाद में उन्हें असम तथा जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्यों का राज्यपाल बनाया गया। पूर्वोत्तर और कश्मीर जैसे क्षेत्रों में उनकी प्रशासनिक समझ और सुरक्षा मामलों का अनुभव काफी अहम माना गया।
इसी तरह पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल जोगिंदर जसवंत सिंह को सेवानिवृत्ति के बाद अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। अरुणाचल प्रदेश चीन सीमा से सटा हुआ राज्य है, इसलिए वहां एक अनुभवी सैन्य अधिकारी की नियुक्ति को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया।
पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एस. एफ. रोड्रिग्स भी उन सैन्य अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें राज्यपाल बनाया गया। उन्हें पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया था और उन्होंने लगभग एक दशक तक इस पद की जिम्मेदारी संभाली। उस समय पंजाब सुरक्षा के लिहाज से एक अहम राज्य माना जाता था, ऐसे में उनके सैन्य अनुभव का प्रशासन को लाभ मिला।
इसके अलावा कृष्ण कांत पॉल भी सेना में सेवा देने के बाद प्रशासनिक क्षेत्र में सक्रिय हुए। बाद में उन्हें उत्तराखंड और मेघालय का राज्यपाल बनाया गया। उनके अनुभव को भी राज्यों के प्रशासनिक संचालन में उपयोगी माना गया।
हालांकि सभी सैन्य अधिकारी राज्यपाल नहीं बने, लेकिन कई वरिष्ठ अधिकारियों ने राजनीति और शासन में भी अहम भूमिका निभाई है। इसका एक उदाहरण पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी. के. सिंह हैं। वह राज्यपाल नहीं बने, लेकिन सेना से सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय राजनीति में आए और केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
इसी कड़ी में अब बिहार के नए राज्यपाल के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन का नाम जुड़ गया है। वह भारतीय सेना के एक प्रतिष्ठित अधिकारी रहे हैं और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में उन्होंने सेना की 15वीं कोर की कमान संभाली थी, जो सबसे संवेदनशील सैन्य इकाइयों में से एक मानी जाती है।
अपने कार्यकाल के दौरान हसनैन कश्मीर में “हार्ट्स एंड माइंड्स” यानी जनता के साथ संवाद और विश्वास बढ़ाने की रणनीति के लिए भी काफी चर्चित रहे। सैन्य अनुभव, रणनीतिक सोच और प्रशासनिक समझ को देखते हुए उन्हें बिहार जैसे बड़े राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है।
कुल मिलाकर यह माना जाता है कि पूर्व सैन्य अधिकारियों को राज्यपाल बनाने से प्रशासन में अनुशासन, तटस्थता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को मजबूती मिलती है। बिहार में सैयद अता हसनैन की नियुक्ति को भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है।