NEWS PR डेस्क: बिहार की राजनीति इन दिनों बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। नए साल की शुरुआत के साथ ही राज्य में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं सामने आई हैं, जो आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय कर सकती हैं। पहले नितिन नबीन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, फिर तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल की कमान संभाली और अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा तेज हो गई है। इन घटनाओं ने संकेत दे दिया है कि बिहार की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।
करीब तीन दशकों से राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार को कई राजनीतिक विश्लेषक एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं, जिन्होंने सामाजिक समीकरण और विकास की राजनीति को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया। यही वजह रही कि उन्हें केवल किसी एक जाति का नेता नहीं माना गया, बल्कि अलग-अलग वर्गों और समुदायों में उनकी स्वीकार्यता बनी रही।
दरअसल, 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्णिया में एक जनसभा को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने संकेत दे दिया था कि यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है। उस समय उन्होंने कहा था, “यह मेरा आखिरी चुनाव है, अंत भला तो सब भला।” हालांकि उस चुनाव में उनकी पार्टी जदयू को 2005 के बाद सबसे कम 43 सीटें मिलीं, लेकिन गठबंधन की राजनीति के कारण वे फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2020 के बाद से ही नीतीश कुमार धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने लगे थे। वे हमेशा अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर बेहद सतर्क रहते थे। इस मामले में उनकी शैली लालू प्रसाद यादव से बिल्कुल अलग मानी जाती है। जहां लालू प्रसाद यादव मंचों पर बेहद अनौपचारिक और खुलकर बोलने वाले नेता रहे, वहीं नीतीश कुमार संयमित और सीमित शब्दों में अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं।
समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी एक पुराने प्रसंग का जिक्र करते हुए बताते हैं कि 1994 में आयोजित कुर्मी चेतना रैली में शामिल होने को लेकर भी नीतीश कुमार असमंजस में थे। उन्हें आशंका थी कि इससे अन्य जातियों में गलत संदेश जा सकता है। काफी समझाने के बाद वे उस कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे उनकी राजनीतिक सोच और सामाजिक संतुलन को लेकर सतर्कता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
झारखंड में जदयू के विधायक और उनके पुराने सहयोगी सरयू राय भी बताते हैं कि नीतीश कुमार बेहद सीमित लोगों के सामने ही खुलकर बात करते थे। कई मौकों पर उन्होंने अपमान भी चुपचाप सह लिया, लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी प्रतिक्रिया नहीं दी। राय एक घटना का जिक्र करते हैं, जब 1992 में दिल्ली स्थित बिहार निवास में लालू प्रसाद यादव ने उनके और ललन सिंह के साथ अपमानजनक व्यवहार किया था। उस समय भी नीतीश कुमार ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

राजनीति में नीतीश कुमार ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई। इस सामाजिक समीकरण को सवर्ण जातियों का भी समर्थन मिला और इसी गठजोड़ ने उन्हें बिहार की सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
2000 के विधानसभा चुनाव में जदयू और बीजेपी गठबंधन को 121 सीटें मिली थीं और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत के अभाव में उन्हें एक सप्ताह के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद राबड़ी देवी कांग्रेस के समर्थन से दोबारा मुख्यमंत्री बनीं।
आखिरकार 2005 में नीतीश कुमार को स्थायी रूप से सत्ता मिली। अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला और वे मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2010 के चुनाव में उन्हें ऐतिहासिक जीत मिली, जब एनडीए गठबंधन ने 243 में से 206 सीटें जीत लीं। यह लालू प्रसाद यादव की राजनीति के लिए बड़ा झटका माना गया।
हालांकि 2013 में जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने का फैसला किया। इसका असर 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा, जब जदयू को केवल दो सीटों पर जीत मिली, जबकि भाजपा ने 22 सीटें अपने नाम कर लीं।
अब जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा तेज है, तो माना जा रहा है कि बिहार की राजनीति में एक युग का अंत हो सकता है। आने वाले समय में तेजश्वी यादव और भाजपा नेतृत्व के बीच राजनीतिक मुकाबला और भी तेज होने की संभावना है।
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का सफर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। अब उनके राज्यसभा जाने की चर्चा के साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या सच में बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होने वाली है।