हरीश राणा को SC से मिली इच्छामृत्यु की इजाजत,देश का पहला मामला, दर्दनाक है युवक की कहानी

Amit Singh
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NEWS PR डेस्क: 13 साल से अचेत अवस्था में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे गाजियाबाद के हरीश राणा को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है। यह देश के उन दुर्लभ मामलों में से एक माना जा रहा है, जहां अदालत ने ऐसी परिस्थिति में जीवनरक्षक उपकरण हटाने की इजाजत दी है, जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची।

31 वर्षीय हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर अचेत पड़े हैं। वह न बोल सकते हैं, न किसी चीज को महसूस कर सकते हैं और न ही अपने आसपास की दुनिया से कोई संवाद कर पाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार उनके दिमाग की नसें गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं और उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।

हरीश कभी एक होनहार और ऊर्जा से भरा युवा था। वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था और पढ़ाई के साथ-साथ बॉडीबिल्डिंग का भी शौकीन था। फिटनेस के प्रति उसका जुनून स्कूल के दिनों से ही था और वह अपने भविष्य को लेकर बेहद गंभीर रहता था। लेकिन 20 अगस्त 2013 का दिन उसकी जिंदगी में ऐसा मोड़ लेकर आया जिसने सब कुछ बदल दिया।

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उस दिन हरीश अपने पीजी की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गया। हादसे में उसके सिर पर गंभीर चोट लगी और उसी के साथ एक सपनों से भरी जिंदगी अचानक ठहर गई। इस दुर्घटना के बाद से वह अचेत अवस्था में चला गया और फिर कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सका।

हरीश के पिता अशोक राणा ने बेटे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। उन्होंने चंडीगढ़ पीजीआई से लेकर दिल्ली के एम्स और कई निजी अस्पतालों तक इलाज करवाया। परिवार ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा, लेकिन डॉक्टरों ने धीरे-धीरे साफ कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है।

बीते 13 वर्षों से हरीश का शरीर बस सांस ले रहा था, लेकिन जिंदगी की कोई हलचल उसमें नहीं थी। कभी-कभार पलकें झपकना ही उसके जीवित होने का एकमात्र संकेत था। बेटे की इस हालत को देखकर माता-पिता भीतर से टूट चुके थे।

आखिरकार जब उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझ गई, तो राणा दंपति ने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए परिवार से बातचीत भी की और चिकित्सा रिपोर्टों का अध्ययन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं हो और उसका जीवन केवल पीड़ा को बढ़ा रहा हो, तो ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। इसी आधार पर अदालत ने हरीश राणा के मामले में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी।

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