NEWS PR डेस्क: बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के तालमेल को लेकर एक नया विवाद सामने आ गया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और बीजेपी के बीच कथित समझौते को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक पत्र ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। दावा किया जा रहा है कि तत्कालीन बिहार बीजेपी अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने चुनावी तालमेल के दौरान आरएलएम को एक विधान परिषद सीट देने पर लिखित सहमति जताई थी। अब जब हाल ही में घोषित एमएलसी उम्मीदवारों की सूची में आरएलएम को जगह नहीं मिली, तो यह मामला खुलकर सामने आ गया है।

आरएलएम नेताओं ने वायरल पत्र के आधार पर बीजेपी पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनावी समझौते के तहत उन्हें विधान परिषद की एक सीट देने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा के समय उस वादे को नजरअंदाज कर दिया गया।
विधान परिषद की 10 सीटों के लिए चुनाव
दरअसल, बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए चुनाव होने हैं और नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने कुल 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें बीजेपी और जदयू के चार-चार उम्मीदवार शामिल हैं, जबकि एक सीट पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने प्रत्याशी उतारा है। दूसरी ओर महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने एक उम्मीदवार मैदान में उतारा है।
संभावना फिलहाल खत्म होती नजर आ रही है
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से चर्चा थी कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जा सकता है लेकिन एनडीए की सूची में उनका नाम नहीं होने से यह संभावना फिलहाल खत्म होती नजर आ रही है।
मंत्री पद को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं
यही वजह है कि अब दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। वर्तमान में वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।

गौरतलब है कि उपेंद्र कुशवाहा स्वयं राज्यसभा सदस्य हैं, जबकि उनकी पत्नी विधानसभा सदस्य हैं। विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद उनके पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी हालांकि सदन की सदस्यता नहीं होने के कारण उनके सामने अब संवैधानिक चुनौती खड़ी हो गई है।
