बांका का बाबरचक: दंगों से उजड़ा गांव बना भारत का पहला स्मार्ट विलेज

Patna Desk
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बांका में बना भारत का पहला स्मार्ट विलेज ‘उन्नत ग्राम’बांका जिले के रजौन प्रखंड अंतर्गत नवादा खरौनी पंचायत के बाबरचक गांव में भूमिहीन और आवासविहीन परिवारों के लिए भारत का पहला स्मार्ट विलेज, ‘उन्नत ग्राम’, विकसित किया गया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस गांव का उद्घाटन किया। इस अवसर पर व्यापक तैयारियां की गई थीं। स्मार्ट विलेज में प्रवेश द्वार, नवसृजित प्राथमिक विद्यालय, साप्ताहिक हाट, सोलर स्ट्रीट लाइट, बैडमिंटन और बास्केटबॉल कोर्ट, दर्शक दीर्घा सहित क्रिकेट मैदान, आंगनवाड़ी पोषण वाटिका, सामुदायिक भवन, जलमीनार, सामुदायिक शौचालय, आंतरिक सड़कें और लगभग 60 परिवारों के लिए आवास बनाए गए हैं। इसके अलावा, गांव में तालाब के चारों ओर सीढ़ियां और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर भी विकसित किया गया है।

दंगों से उजड़ा बाबरचक बना भूमिहीनों का बसेरा-

1989 में भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे की चपेट में बाबरचक गांव भी आ गया था। उस दौरान दंगाइयों ने यहां के घरों में आग लगा दी, जिससे लोग जान बचाकर पलायन करने पर मजबूर हो गए। दंगे से पहले बाबरचक और अराजी बाबरचक में 50 से अधिक मुस्लिम परिवार रहते थे, लेकिन हिंसा के बाद उन्होंने अपनी जमीन औने-पौने दामों में बेच दी और बलियास, कुरुडीह, अगरपुर पीथना, कहलगांव सहित अन्य गांवों में बस गए।दंगे के बाद यह गांव उजाड़ हो गया और बेचिरागी (निर्जन) घोषित कर दिया गया। लेकिन फरवरी 2023 में बिहार सरकार और जिला प्रशासन ने इस निर्जन गांव को पुनः आबाद करने की योजना बनाई। इस परियोजना के तहत 162 भूमिहीन और आवासविहीन परिवारों को यहां पुनः बसाया गया और उनके लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस घर बनाए गए। 2023 में धीमी गति से चले निर्माण कार्य में जनवरी 2024 के बाद तेजी आई और जनवरी 2025 के अंत तक अधिकांश कार्य पूरे होने के बाद मुख्यमंत्री ने इसका उद्घाटन किया।

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बाबकरचक से बाबरचक बनने की कहानी

बाबरचक गांव का मूल नाम ‘बाबकरचक’ था। गांव के बुजुर्गों, सेवानिवृत्त शिक्षक नरेश प्रसाद चौधरी, अरुण कुमार सिंह और डीलर राजेंद्र महतो के अनुसार, अंग्रेजों के जमाने में यहां एक सिंचाई कचहरी थी, जहां आसपास के किसानों से सिंचाई टैक्स वसूला जाता था।स्थानीय शिक्षाविदों के अनुसार, “बाब” का अर्थ जल, “कर” का अर्थ कर (टैक्स), और “चक” का अर्थ गांव होता है। इन तीन शब्दों से मिलकर यह नाम बना। इस कचहरी का अंतिम तहसीलदार बाबरचक गांव के दुखा यादव थे। अंग्रेजों के शासन समाप्त होने के बाद सिंचाई कर वसूली का काम भी बंद हो गया और कचहरी खत्म हो गई। आजादी के बाद कुछ उत्साही छात्रों ने गांव का नाम ‘बाबकरचक’ से बदलकर ‘बाबरचक’ कर दिया, जो अब तक प्रचलन में है।

अपराध से शिक्षा की ओर बढ़ता बाबरचक-

70-80 के दशक में बाबरचक अपराध के लिए कुख्यात था। गरीबी और भुखमरी के कारण कई युवा अपराध के दलदल में फंस गए थे। छोटी रकम के लिए भी लोग हत्या करने से नहीं चूकते थे। समय के साथ अपराधियों का सफाया हुआ या वे समाज की मुख्यधारा में लौट आए। इसके बाद गांव में शिक्षा का प्रसार बढ़ा।

बाबरचक से कई शिक्षाविदों का जन्म हुआ, जिनमें मनोहर प्रसाद सिंह, नवीनचंद्र चौधरी, नरेश प्रसाद चौधरी, मुरलीधर सिंह, अरुण कुमार सिंह और सुभाष चंद्र सिंह प्रमुख हैं। वर्तमान में इस गांव के लोग रेलवे, बैंक, सेना और सचिवालय जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में कार्यरत हैं। हर साल यहां बड़ी संख्या में छात्र मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास कर रहे हैं। एक समय गरीबी और अपराध के लिए बदनाम यह गांव अब शिक्षा और समृद्धि का उदाहरण बन चुका है।स्मार्ट विलेज की नई पहचानअब बाबरचक आधुनिक सुविधाओं से युक्त ‘स्मार्ट विलेज’ बन चुका है। यहां के लोग बेहतर जीवन जी रहे हैं और बिहार सरकार की यह पहल सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के पुनर्वास का एक आदर्श मॉडल बन गई है।

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