भागलपुर सबौर कॉलेज के पास जमीन के एक पुराने विवाद को लेकर बनारस में रह रहे बुजुर्ग पवन कुमार सिंहानिया जिला समाहर्ता कार्यालय पहुंचे उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और न्यायालय के आदेश प्रस्तुत करते हुए जमीन की स्थिति की जांच कराने तथा मामले में प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की है उनका आरोप है कि विवादित भूमि पर निर्माण कार्य कराया जा रहा है, जबकि इस जमीन को लेकर न्यायालय में लंबे समय से मामला चला है !
सिंहानिया के मुताबिक, सबौर कॉलेज के पूरब स्थित करीब 24 से 39 डिसमिल जमीन उनके पूर्वजों की संपत्ति रही है। उनका दावा है कि पुराने भू-सर्वेक्षण के दौरान रिकॉर्ड में हुई त्रुटि के कारण जमीन की प्रविष्टि सरकारी खाते में हो गई। इसी को लेकर परिवार की ओर से वर्ष 1993-94 के आसपास न्यायालय में मामला दायर किया गया था पवन कुमार सिंहानिया का कहना है !
कि जमीन के स्वामित्व को लेकर चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया में परिवार की ओर से विभिन्न दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। उनका दावा है कि न्यायालय से उनके पक्ष में आदेश भी प्राप्त हुआ। इसके बाद संबंधित जमीन को लेकर उच्च न्यायालय से यथास्थिति बनाए रखने और निर्माण से संबंधित निर्देश जारी किए गए थे हालांकि, इन आदेशों की वर्तमान स्थिति और विवादित जमीन पर उनका वास्तविक प्रभाव क्या है, यह संबंधित न्यायालयी दस्तावेजों और राजस्व अभिलेखों के आधिकारिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगा सिंहानिया का आरोप है कि वर्ष 2016 के आसपास कॉलेज की बाउंड्री का विस्तार करते समय विवादित जमीन का हिस्सा भी घेराबंदी में शामिल हो गया था। उन्होंने उस समय भी अपनी आपत्ति दर्ज कराने की बात कही है अब उनका कहना है कि हाल में जब वह अपनी जमीन की स्थिति देखने के लिए भागलपुर पहुंचे तो वहां निर्माण कार्य दिखाई दिया इसके बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया ,
और मामले की जांच की मांग की दूसरी ओर,
किसी भी शैक्षणिक संस्थान की ओर से जमीन पर निर्माण या बाउंड्री से संबंधित कार्रवाई किस रिकॉर्ड और अनुमति के आधार पर की गई है, यह भी प्रशासनिक जांच का विषय होगा। फिलहाल उपलब्ध शिकायत के आधार पर कॉलेज प्रशासन की ओर से जमीन के स्वामित्व या निर्माण को लेकर अंतिम स्थिति सामने नहीं आई है सिंहानिया ने बताया कि उन्होंने सबौर थाना में भी लिखित आवेदन दिया है। उनका कहना है कि आवेदन के साथ जमीन से जुड़े दस्तावेज और न्यायालय के आदेश भी उपलब्ध कराए गए हैं।
उन्होंने पुलिस से विवादित स्थल पर स्थिति की जांच करने और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है हालांकि, जमीन से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई का आधार राजस्व रिकॉर्ड और सक्षम न्यायालय के आदेश भी होते हैं। इसलिए पूरे मामले में प्रशासनिक और राजस्व स्तर पर दस्तावेजों का सत्यापन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस विवाद में सबसे अहम सवाल जमीन के वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड और ,
न्यायालय के आदेशों के बीच स्थिति का है। जमीन किसके नाम दर्ज है, पुराने सर्वे रिकॉर्ड में क्या प्रविष्टि है, बाद में उसमें कोई संशोधन हुआ या नहीं और न्यायालय ने अलग-अलग चरणों में क्या आदेश दिए हैं—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक होगी ऐसे मामलों में अंचल कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण होती है संबंधित राजस्व अधिकारी जमीन के खतियान, जमाबंदी, नक्शा और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच कर सकते हैं न्यायालय के आदेशों की प्रमाणित प्रतियों से मिलान के बाद ही प्रशासन के लिए आगे की कार्रवाई का आधार तैयार होगा सिंहानिया के अनुसार, जमीन से संबंधित विवाद तीन दशक से अधिक पुराना हैवर्ष 1993-94 के आसपास शुरू हुई
कानूनी प्रक्रिया के बावजूद जमीन की स्थिति को लेकर विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है बुजुर्ग का कहना है कि बनारस में रहने के कारण उन्हें बार-बार भागलपुर आकर मामले को आगे बढ़ाना पड़ रहा हैउनका उद्देश्य अपनी पैतृक संपत्ति से जुड़े अधिकारों की स्थिति स्पष्ट कराना और न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराना है जिला समाहर्ता कार्यालय में दिए गए आवेदन में उन्होंने संबंधित अंचलाधिकारी से स्थल निरीक्षण कराने, राजस्व अभिलेखों की जांच करने और न्यायालय के आदेशों के आधार पर जमीन की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
मामले में प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड, न्यायालयी आदेश और वर्तमान स्थल की स्थिति—तीनों का मिलान किया जाए यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार का अंतर मिलता है तो उसके आधार पर संबंधित विभाग आगे की प्रक्रिया तय कर सकता है !
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि,
विवादित जमीन पर निर्माण वैध है , या अवैध इसका निर्धारण संबंधित रिकॉर्ड, न्यायालय के आदेश और प्रशासनिक जांच के आधार पर ही किया जा सकेगा सबौर क्षेत्र में जमीन की बढ़ती कीमत और शैक्षणिक संस्थानों के विस्तार के बीच पुराने भू-विवादों का सामने आना प्रशासन के लिए भी चुनौती है। ऐसे मामलों में किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम मानने के बजाय सभी संबंधित दस्तावेजों की जांच और दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय लेना जरूरी है अब इस मामले में जिला प्रशासन की जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि विवादित भूमि का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है, न्यायालय के आदेशों की स्थिति क्या है और मौके पर चल रहे निर्माण के संबंध में किस प्रकार की कार्रवाई की जानी है।
भागलपूर से श्यामानंद सिंह रिपोर्ट ;-