NEWS PR डेस्क: गया,14 जून। बिहार के गया जिले के ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बाद स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों में खुशी का माहौल है। सदियों पुरानी इस अनूठी शिल्पकला को अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। कारीगरों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से न केवल उनकी कला का संरक्षण होगा, बल्कि देश-विदेश के बाजारों में उनकी कलाकृतियों की मांग भी बढ़ेगी।
गया जिले का पत्थरकट्टी गांव पिछले लगभग 300 वर्षों से अपनी अद्वितीय पत्थर शिल्पकला के लिए जाना जाता है। यहां के कुशल शिल्पकार स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, भगवान विष्णु समेत विभिन्न देवी-देवताओं की आकर्षक और जीवंत मूर्तियां तैयार करते हैं। इन मूर्तियों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी रही है।
कारीगरों का कहना है कि लंबे समय से पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट को जीआई टैग दिलाने की मांग की जा रही थी। अब यह मांग पूरी होने के बाद उन्हें अपने उत्पादों को एक विशिष्ट पहचान के साथ बाजार में उतारने का अवसर मिलेगा। इससे नकली उत्पादों पर भी रोक लगेगी और असली शिल्पकारों को उनके हुनर का उचित मूल्य मिल सकेगा।

300 साल पुरानी है शिल्पकला की विरासत
स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब ढाई से तीन सौ वर्ष पहले अहिल्याबाई होल्कर ने जयपुर से गौड़ समुदाय के शिल्पकारों को गया बुलाया था। इन्हीं कारीगरों ने स्थानीय ग्रेनाइट पत्थरों से प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर का निर्माण किया था। समय के साथ कुछ परिवार यहां से अन्य स्थानों पर चले गए, लेकिन कई गौड़ परिवार पत्थरकट्टी में ही बस गए और आज भी अपने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
आज पत्थरकट्टी के शिल्पकार न केवल गया बल्कि बिहार के अन्य जिलों में भी जाकर मूर्तियां बनाने का कार्य करते हैं। बड़ी संख्या में कारीगर विष्णुपद मंदिर क्षेत्र के आसपास भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यहां आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालु और पर्यटक इन मूर्तियों को खरीदकर अपने साथ ले जाते हैं।
जीआई टैग से बढ़ेंगी बाजार की संभावनाएं
गौड़ समुदाय से जुड़े कारीगरों का कहना है कि जीआई टैग मिलने के बाद अब उनकी मूर्तियां एक प्रमाणित पहचान के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकेंगी। इससे कारोबार में वृद्धि होगी और स्थानीय युवाओं को भी रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। कारीगरों का मानना है कि अब वे अपनी कलाकृतियों को अपने ब्रांड नाम से भी बेच सकेंगे, जिससे उनकी पहचान और मजबूत होगी।
हालांकि कुछ शिल्पकारों ने चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना है कि ग्रेनाइट पत्थरों की कीमत और मजदूरी दोनों बढ़ गई हैं, जबकि बाजार में लोग कम कीमत वाले उत्पादों की मांग करते हैं। ऐसे में लागत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पा रहा है।
सरकार से सहयोग की उम्मीद
कारीगरों ने सरकार से अधिक सहयोग की मांग करते हुए कहा कि यदि उचित प्रोत्साहन और सुविधाएं मिलें तो यह कला वैश्विक स्तर पर और बड़ी पहचान बना सकती है। उन्होंने यह भी इच्छा जताई कि भविष्य में यदि गया में किसी बड़े धार्मिक स्मारक या विशाल मूर्ति का निर्माण हो तो उसमें स्थानीय शिल्पकारों को प्राथमिकता दी जाए।
स्थानीय समाजसेवी संतोष ठाकुर ने कहा कि नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘लोकल फॉर वोकल’ के संदेश ने स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाई है। उनका मानना है कि जीआई टैग मिलने से पत्थरकट्टी के कारीगर अब अपनी विशिष्ट कला को ब्रांड के रूप में स्थापित कर सकेंगे और देश-विदेश के बाजारों में अपनी अलग पहचान बना पाएंगे।
जीआई टैग मिलने के साथ ही पत्थरकट्टी की सदियों पुरानी शिल्प परंपरा को एक नया मंच मिला है। अब उम्मीद की जा रही है कि यह विरासत न केवल संरक्षित होगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर बिहार की सांस्कृतिक पहचान को भी और मजबूत करेगी।
