पटना HC के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सलवार उतारने की कोशिश वाले मामले में लिया स्वतः संज्ञान

Rashmi Tiwari

NEWS PR डेस्क : पटना हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताते हुए मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। मामला एक महिला से छेड़छाड़ और उसकी सलवार उतारने की कोशिश से जुड़ा है। पटना हाईकोर्ट ने इन घटनाओं को महिला की गरिमा भंग करने वाला कृत्य तो माना था, लेकिन इसे रेप की कोशिश का अपराध नहीं माना था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताते हुए मामले के तथ्यों की समीक्षा करने का फैसला किया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपी को सुने बिना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बिहार के एडवोकेट जनरल एस.डी. संजय को आरोपी तक नोटिस पहुंचाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। इसके लिए स्थानीय पुलिस की सहायता लेने को कहा गया है।
2008 का है मामला
सुप्रीम कोर्ट का यह संज्ञान पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले से जुड़ा है। मामला वर्ष 2008 का है और बिहार के बांका जिले का है। मामले के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए आरोपी के स्टूडियो गई थी। आरोप है कि आरोपी ने महिला के पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। इसके बाद उसने महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसके सीने को दबाकर उसके साथ छेड़छाड़ की। महिला के शोर मचाने पर उसके पिता ने दरवाजा खोलने की कोशिश की। इसी दौरान आरोपी मौके से भाग गया।
हाईकोर्ट ने रेप की कोशिश का आरोप माना था साबित नहीं
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि घटना से महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं होता। कोर्ट के अनुसार, रेप की कोशिश साबित करने के लिए ऐसे स्पष्ट कृत्य होने चाहिए, जिनसे आरोपी की रेप करने की मंशा दिखाई दे। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत मिली सजा को रद्द करते हुए मामले को धारा 354 IPC के तहत माना था।
सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया पुराना मामला
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता और एच.एस. फुल्का ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान फरवरी 2026 में दिए गए एक अन्य फैसले की ओर भी दिलाया। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा था, जिसमें नाबालिग लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार के मामले में आरोपी के कृत्यों को रेप की कोशिश नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में अदालतों द्वारा संवेदनशीलता बरतने की जरूरत पर जोर दिया था।

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