NEWS PR डेस्क: गया में एक ऐसा अनोखा कारोबार होता है, जहां कचरा भी लाखों रुपये में बिकता है। जी हां, यह कोई आम कचरा नहीं, बल्कि सोने-चांदी के आभूषण बनाने के दौरान निकलने वाली बेशकीमती धूल और बुरादा है। इसे सुनार की भाषा में ‘न्यारा’ कहा जाता है। इसकी कीमत 25 हजार से लेकर 5 लाख रुपये या उससे भी अधिक होती है। खास बात यह है कि इसकी बिक्री साल में सिर्फ एक बार दीपावली के आसपास होती है। आइए जानते हैं, आखिर कैसे कचरे से होता है लाखों का कारोबार।
गया शहर की सर्राफा मंडी और आसपास के इलाकों में करीब 300 से 350 आभूषण की दुकानें हैं। इन दुकानों में सालभर सोने-चांदी के गहने बनाए जाते हैं। इस दौरान कटाआशीष कुमार की रिपोर्ट ;-ई, घिसाई और छंटाई से निकलने वाले सोने-चांदी के बारीक कण धूल के साथ जमा होते रहते हैं। दुकानदार इसके लिए अलग डिब्बा रखते हैं। इसी कचरे को न्यारा कहा जाता है।
इस न्यारे को खरीदने के लिए दीपावली के समय विशेष खरीदार गया पहुंचते हैं। इन्हें न्यारी जाति के लोग कहा जाता है। ये लोग इस काम में इतने पारंगत होते हैं कि हाथ पर थोड़ी सी धूल रखते ही उसमें मौजूद सोने-चांदी के कणों का अंदाजा लगा लेते हैं। इसके बाद वे न्यारे की कीमत तय कर बोली लगाते हैं।
न्यारे की कीमत दुकान में काम करने वाले कारीगरों और सालभर हुए काम पर निर्भर करती है। कहीं यह 25 हजार, 50 हजार तो कहीं एक लाख, दो लाख और 5 लाख रुपये से भी अधिक में बिकता है।
कारीगर मोनू कुमार सोनी बताते हैं कि सालभर आभूषण बनाने के दौरान निकलने वाले कणों को सुरक्षित जमा किया जाता है। दीपावली के समय इसे बेचने पर अच्छी कमाई होती है। इस बार भी वे 50 हजार रुपये का न्यारा बेच चुके हैं।
वहीं, कारोबारी सुमित कुमार सोनी के मुताबिक, न्यारा बेचने से दुकानदारों को दीपावली और दुकान की साफ-सफाई का खर्च निकालने में मदद मिलती है।
कैसे निकलता है सोना
न्यारा खरीदने वाले कारीगर इस कचरे को विशेष तरीके से साफ करते हैं। इसके बाद उसमें से सोना, चांदी, तांबा और दूसरी धातुओं को अलग-अलग निकालते हैं। इस काम में उनके लंबे अनुभव और पारंपरिक हुनर की अहम भूमिका होती है। गया में न्यारा खरीदने के लिए बनारस, सासाराम, झारखंड और दिल्ली से भी खरीदार पहुंचते हैं।