जांघ की हड्डी टूटी 18 महीने तक ईलाज करवाया, गरीबी और परेशानियों के बावजूद भागलपुर की खुशी ने जीता गोल्ड मेडल

Patna Desk
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भागलपुर कहते हैं जब हौसला ऊँची उड़ान का हो तो सारी मुश्किलें हल हो जाती है जब ललक कुछ कर दिखाने का हो तो रास्ते मे आ रही बाधाएं भी पार हो जाती है इस पंक्ति को चरितार्थ किया है भागलपुर की खुशी यादव ने जिसने गरीबी और तमाम परेशानियों के बावजूद खेलो इंडिया यूथ गेम्स में गोल्ड मेडल पर कब्जा जमा लिया जी हाँ हम बात कर रहे हैं भागलपुर के शाहजंगी नवटोलिया के रहने वाले सुनील यादव की बेटी खुशी यादव की जिसके जुनून ने सबको चौंका दिया कर दिखाया.

कुछ ऐसा की स्पोर्ट्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया के सदस्यों के साथ साथ सभी लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली दरअसल खुशी अपने ही गाँव में कोच जितेंद्र मणि से ऊँची कूद की ट्रेनिंग लिया करती थी लेकिन कोच ने उसे हर विधा में माहिर बना दिया। खुशी का सेलेक्शन स्पोर्ट्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया सिलीगुड़ी में दो साल पहले हुआ था इसके पहले वह तरंग प्रतियोगिता में ऊँची कूद के दौरान घायल हो गयी थी। जांघ के ऊपर हड्डी क्रैक हो गया था लेकिन साई के प्रभारी वसीम अहमद ने कोलकाता में खुशी का ईलाज करवाया 18 महीने तक ईलाज हुआ जिस तरह चोट लगी थी ऐसे हालात में 90 प्रतिशत ठीक होने के चांसेस नहीं होते है लेकिन खुशी अपने जुनून और जज्बे के आगे उस दर्द को भी मिटा दिया लेकिन खुशी लॉन्ग जम्प नहीं कर सकती थी इसके बाद 5 महीने पहले उसने लॉन्ग जम्प को बदल बाधा दौड़ को अपनाया जब खेलो इंडिया यूथ गेम्स में भागीदारी हुई तो स्पोर्ट्स ऑथोरिटी ने उसे उस काबिल बनाया की वह दौड़ सकती थी।

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खुशी ने पटना के पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में दो हजार मीटर के बाधा दौड़ में हिस्सा लिया जहाँ वह सारे बाधाओं को पार कर सर्वोच्च स्थान पर पहुँच गयी इतना ही नहीं बाधाओं से भरी लंबी दौड़ के बावजूद भी खुशी ने 20 मिनट में ही 400 गुना 400 मीटर रिले दौड़ के लिए भी वह तैयार हो गयी. उसमें उसने 5वां स्थान प्राप्त किया निर्णायक, कोच, खिलाड़ी खुशी के जज्बे से आश्यर्च में थे खुशी के पिता मजदूरी करके घर चलाते हैं. कई तरह की परेशानियों को झेलते हुए खुशी आगे बढ़ रही है लक्ष्य ओलंपिक खेलने और इंटरनेशनल गेम्स खेलने और गोल्ड जितने का है भागलपुर आने पर खुशी का जोड़दार स्वागत हुआ। कोच जितेंद्र मणि ने खेत की पगडंडियों से सफलता की पहली सीढ़ी तक पहुँचा दिया। माता पिता इस उपलब्धि पर फुले नहीं समा रहे है।

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