नियम पीछे, रसूख आगे: बिहार में ट्रांसफर से ज्यादा प्रतिनियुक्ति का खेल

Neha Nanhe

NEWS PR डेस्क : बिहार के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों तबादले और प्रतिनियुक्ति को लेकर अजीब तरह की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं। कागजों पर तो ट्रांसफर नीति का पालन करने की बात कही जाती है, लेकिन हकीकत में प्रतिनियुक्ति के जरिए कई कर्मचारी फिर से वहीं पहुंच जाते हैं, जहां वे पहले से जमे हुए थे। खासकर पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में इस तरह की व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि चाहे किसी बाबू का ट्रांसफर कहीं भी कर दिया जाए, कुछ ही समय बाद वह किसी न किसी तरीके से जिला मुख्यालय के अहम और ‘मलाईदार’ माने जाने वाले विभागों में वापस दिखाई देता है।

नियमों के अनुसार, बाबुओं और कर्मचारियों का तीन साल की अवधि पूरी होने के बाद अलग-अलग प्रखंड, अंचल और अनुमंडल में तबादला किया जाता है। लेकिन चर्चा यह है कि कई मामलों में यह प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाती है। ट्रांसफर आदेश जारी होने के कुछ ही दिनों बाद प्रतिनियुक्ति के आदेश निकलते हैं और संबंधित कर्मचारी फिर से जिला मुख्यालय में तैनात हो जाते हैं। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ट्रांसफर नीति का सही मायनों में पालन हो रहा है या नहीं।

इसी क्रम में एक क्लर्क मुन्ना सिंह का मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ समय पहले उनका रिश्वत लेते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसके बाद उन्हें पहाड़पुर प्रखंड कार्यालय भेज दिया गया था। लेकिन बताया जा रहा है कि करीब दो महीने के भीतर ही प्रतिनियुक्ति के जरिए उन्हें दोबारा जिला मुख्यालय की विकास शाखा में तैनात कर दिया गया। इस घटनाक्रम को लेकर प्रशासनिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।

इसी तरह अभिषेक गिरी से जुड़ा मामला भी सामने आया है। लगभग ढाई साल पहले उनका तबादला अरेराज अनुमंडल कार्यालय में किया गया था। हालांकि कुछ ही समय बाद प्रतिनियुक्ति के आधार पर वे जिला भू-अर्जन कार्यालय में कार्यरत रहे। हाल ही में जब उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त हुई तो उन्होंने अरेराज में योगदान दिया, लेकिन बताया जाता है कि दो दिन बाद ही बिना स्वीकृत अवकाश के अनुपस्थित हो गए। सूत्रों के अनुसार इस संबंध में अरेराज के एसडीओ सह प्रशिक्षु आईएएस ने उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भी भेजी है।

सरकारी स्तर पर प्रतिनियुक्ति को आम तौर पर कार्यहित या विशेष आवश्यकता का हवाला देकर किया जाता है। हालांकि स्थानीय स्तर पर इस व्यवस्था को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कई लोग इसे प्रभाव, पहचान और आपसी तालमेल से जोड़कर भी देख रहे हैं।

फिलहाल यह पूरा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। अगर प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया और उससे जुड़े फैसलों की गहराई से जांच की जाए, तो यह साफ हो सकता है कि ट्रांसफर नीति का वास्तविक रूप में कितना पालन हो रहा है और जिला मुख्यालय में लंबे समय से जमे कर्मचारियों की तैनाती के पीछे असल वजह क्या है।

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